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माँ तुम - श्रीमती वन्दना जोशी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला "हिम मन मन्थन"में   प्रस्तुत है, आज  जनपद-चम्पावत, से शिक्षिका बहिन श्रीमती वन्दना जोशी जी द्वारा रचित कविता-: 🙏✍️ माँ तुम  मांँ तुम ईश्वर का दिया,  अनुपम उपहार हो।  जन्म-जन्मान्तर तक,  तुम्हारी जय जयकार हो।।  इस धरती पर लाई,  धन्यवाद बारम्बार हो।  श्रद्धा, दया, प्रेम, त्याग की,  मूरत साकार हो।।  ईश्वर के रूप में,  हर जीव ने मांँ को पाया।  मांँ के आंँचल में,  सम्पूर्ण संसार समाया।।  कदम-कदम पर चलना,  जीना सिखाया।  हार जीत में हर पल,  साथ निभाया।।  गिरते, पड़ते, उठते,  दौड़ते होश संँभाला।  मांँ को अपने आस-पास,  संँभालते पाया।।  थक हार कर जब,  घर वापस आया।  मांँ को ठण्डी छांँव लिए,  इन्तजार में पाया।।  तुम धैर्य हो,  सहनशक्ति का पुंँज हो।  मांँ तुम नव जीवन की, जन्मदाता हो।।  अतुलनीय अप्रतिम,  ईश्वरीय उपहार हो। आने वाली पीढ़ी की,  भाग्य विधाता हो।। 🙏 रचना-: वन्दना जोशी (स०अ०)...

गौतम बुद्ध

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला "हिम मन मन्थन"में   'बुध पूर्णिमा'  पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है, स्वरचित कविता -: 🙏✍️ बुद्ध अवतार  जब यज्ञों में बढ़ी थी हिंसा, धर्म हुआ था कहीं लुप्त सा।  वेदों का अर्थ हुआ विकृत, मानव बन बैठा था कठोर सा।।  तब करुणा का दीप जलाकर, धरती पर अवतार हुआ।  विष्णु ने बुद्ध बन आकर, सत्य का फिर विस्तार किया।।  राजा शुद्धोधन के घर जन्मे, माता माया देवी की छाया में।  गौतम बुद्ध ने लुंबिनी धाम में, जन्म लिया इस पावन माया में।। लुम्बिनी की पावन भूमि पर, ज्ञान का प्रथम उजियारा छाया।  सिद्धार्थ से बुद्ध बने जब, जग ने सत्य का पथ अपनाया।। न शस्त्र उठाए, न युद्ध किया, अहिंसा का संदेश दिया।  प्रेम, दया और शान्ति से ही, जीवन का सच्चा मार्ग दिखा दिया।।  गौतम बुद्ध के रूप में आकर, मोह-माया का जाल हटाया, असुरों को भी सत्य की राह पर, धीरे-धीरे फिर से लाया।।  जहाँ थी क्रूरता की छाया, वहाँ करुणा का फूल खिला।  अज्ञान के अंधकार में, ज्ञान का दीपक फिर जला।। यह अवतार सिखाता हमको, क्रोध नहीं, बस...