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अप्रैल, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्री हनुमान जी एक निष्ठावान चरित्र-श्रीमती विजयलक्ष्मी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज श्री हनुमानजी की पावन जयन्ती के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती विजयलक्ष्मी  जी का लेख:- श्री हनुमान जी एक निष्ठावान चरित्र  ========================     हमारा देश भारतवर्ष  दिव्य शक्तियों की मान्यता का देश है। भारतीय सनातन धर्म में हनुमानजी का विशेष स्थान है।   हनुमान जी भगवान श्री राम के परम भक्त कहलाए जाते हैं। चैत्र महीने की पूर्णिमा के दिन अञ्जनी माता और महाराज केसरी ने बहुत तपस्या के पश्चात एक महान शक्तिशाली, महान तेजस्वी रुद्र अवतार के रूप में एक पुत्र रत्न को पाया।  ऐसा असाधारण  दिव्य बालक जो जन्म के कुछ  समय बाद ही अपनी भूख मिटाने के लिए बहुत बड़े आग के पुञ्ज सूर्यदेव को  फल समझकर निगल गया। सारी सृष्टि में घोर अंँधेरा छा गया। तभी देवराज इन्द्र ने अपने वज्र का प्रहार इस असाधारण बालक की ठुड्डी  (हनु )पर की। वज्र के प्रहार से बालक की ठुड्डी टेड़ी हो गयी। इसी से इनका नाम हनुमान पड़ गया। हनुमान जी के और भी नाम हैं जैसे- मार...

श्री हनुमान जयन्ती-श्री कमलेश कुमार सती

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज श्री हनुमानजी की पावन जयन्ती  के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद नैनीताल  से शिक्षक बन्धु बहिन श्री कमलेश कुमार सती जी का लेख:- श्री हनुमान जयन्ती मनोजवं मारुतुल्यवेगं जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्, वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये। अतुलित बलधामं, हेमशैलाभदेहमं, दनुजवनकृशानुं,ज्ञानिनामग्रगण्म्। सकलगुण निधानं, वानराणामधीशम्,  रघुपतिप्रिय भक्तं वातजातम् नमामि। रामभक्त हनुमान को कलियुग का एकमात्र पृथ्वी पर उपस्थित देवता माना जाता है। भगवान हनुमान जल्द प्रसन्न होने वाले संकटमोचक देवता हैं। जो भक्त सच्चे मन और पवित्र भाव से बजंरग बली की पूजा और आराधना करते हैं, भगवान उनके जीवन में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं। चैत्र माह की पूर्णिमा को हनुमान जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दिन मंदिरों में हनुमान जी की विधि विधान से पूजा की जाती है।  हनुमान जन्मोत्सव को लोग हनुमान मन्दिर में दर्शन हेतु जाते है। कुछ लोग व्रत भी धारण कर बड़ी उत्सुकता और जोश के साथ समर्पित होकर इनकी पूजा करते है। ...

हिमालय पुत्र हेमवती नन्दन बहुगुणा-श्रीमती माधुरी नैथानी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज हिमालय पुत्र हेमवती नन्दन बहुगुणा की पावन जयन्ती  के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती माधुरी नैथानी जी का लेख:- हिमालय पुत्र हेमवती नन्दन बहुगुणा  हिमालय जैसा दृढ़ संकल्प एवं विराट व्यक्तित्व के धनी हेमवती नन्दन बहुगुणा जी का जन्म पौड़ी गढ़वाल के बुघाणी गाँव में 25 अप्रैल 1920 को रेवती नन्दन बहुगुणा जी के घर में हुआ था।  मध्य हिमालय की तलहटियों में जन्मे इस महानुभाव के अन्दर राजनैतिक विलक्षणता, संघर्ष शीलता, समाज- उत्थान की परिकल्पना व गजब का आत्म-बल था। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय देवलगढ़ तथा मिडिल क्लास शिक्षा खिर्सू से पूरी करने के बाद बहुगुणा जी ने आगे की शिक्षा डी०ए०वी०कालेज देहरादून से पूरी कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की। तथा यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले बहुगुणा जी को पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने 5000 रु० तक का इनाम रखा। राजनीति में माहिर होने पर सभी दिग्गज इनसे भयभीत रहते ...

चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर-श्रीमती रेखा पुरोहित

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  आज भगवान महावीर स्वामी जी की पावन जयन्ती  के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती रेखा पुरोहित जी का लेख:- चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर    भारतीय संस्कृति में वीर की उपाधि दो ही मनुष्यों को दी गयी है प्रथम वीर विक्रमादित्य एवं द्वितीय भगवान महावीर।  कहा जाता है कि जब भी समाज में हिंसा, जाति-पाति का भेदभाव, पशु बलि आदि बहुत बढ़ जाती है तो समाज को सही दिशा व धर्म का ज्ञान करवाने के लिए किसी न किसी महापुरुष का इस धरती पर अवतरण होता है। भगवान महावीर का भी जन्म ऐसे ही समय में हुआ।    जैन धर्म के २४वे तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पहले वैशाली के गणतन्त्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ हुआ था। कहा जाता है कि इनके जन्म के बाद इनके राज्य की उन्नति होने के कारण इनका नाम वर्धमान रखा गया। इनका विवाह यशोदा नामक कन्या से हुआ था तथा कालान्तर में प्रियदर्शनी नामक एक कन्या के पिता बने।...

किताबों का महत्व-श्रीमती रीता सेमवाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में विश्व पुस्तक एवं काॅपीराइट दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती रीता सेमवाल जी का लेख:- किताबों का महत्व किताबें वे मधुमक्खियाँ हैं जो एक से दूसरे मन तक त्वरित पराग ले जाती हैं।  हर साल यूनेस्को विश्व पुस्तक दिवस मनाता है। इसके माध्यम से पुस्तक पढ़ने की आदत बनती है। कई लेखकों के जन्म वर्ष और मृत्यु वर्षगाँठ पर यह विश्व पुस्तक दिवस मनाया जाता है।  स्पेन में 23 अप्रैल को फूल बाँटे जाते थे, बाद में लेखकों की याद में इसे पुस्तक दिवस के रूप में मनाया जाने लगा, और इस दिन फूलों की जगह पुस्तकों को बाँटा गया। इस दिन कहीं मुफ्त में किताबें, कहीं प्रतियोगिताएंँ और कहीं लेखन प्रतियोगिताएंँ आयोजित की जाती हैं। इसका मकसद बच्चों में पढ़ने के प्रति प्रोत्साहन जागृत करना है। किताबें हर किसी की जिन्दगी का हिस्सा होती हैं। किताबें अकेलापन दूर करने के साथ-साथ ज्ञान में भी वृद्धि करती हैं। कहा भी गया है-किताबें मनुष्य की सबसे अच्छी मित्र होती हैं।  विश्व पुस्तक दिवस मनाने का एकमात...

पुस्तकालय का महत्व-श्री गजेन्द्र रौतेला

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  विश्व पुस्तक एवं काॅपीराइट दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद रुद्रप्रयाग  से शिक्षक बन्धु श्री  गजेन्द्र रौतेला जी का लेख:- पुस्तकालय का महत्व  ---------------------------------------- हमारे पढ़ने लिखने के साथ ही हमारे आसपास जो शब्द  तैरते हैं उनमें से एक शब्द लाइब्रेरी या पुस्तकालय भी है। सामान्यतः इसे हम पुस्तकों के एक ढेर या जखीरे के रूप में देखना शुरू कर लेते हैं।ये बेहद औपचारिक और परम्परागत धारणा है हमारे मन की। लेकिन जहाँ तक स्कूली शिक्षा में लाइब्रेरी या पुस्तकालय का सन्दर्भ है तो मुझे लगता है कि यह एक बहु गतिविधि आधारित रचनात्मक केन्द्र है जहाँ पर बच्चे अपनी रुचि से कुछ भी नया सृजन करने के लिए स्वतन्त्र होते हैं दूसरे शब्दों में कहें तो अपने मन की और मन की जिज्ञासाओं को स्वयं अपने हाथों से करके देखकर तसल्ली कर लेने की ख्वाहिश होती है। कुल मिलाकर यह कि स्कूली पुस्तकालय एक ऐसा केन्द्र हो जो बच्चों के सवालों के जवाब उन्हें खुद तलाशने में मदद कर पा रहे हों।  बेशक वक़्त और तकनीक के साथ पुस...

रेत की कहानी-

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है आज जनपद नैनीताल से शिक्षक बन्धु श्री  विनोद सुयाल  जी की कविता:- रेत की कहानी  पर्वतों के शीष में,  पठारों के बीच में, नदियों के आँचल में,  सागर की गहराई में, रची हूँ मैं, बसी हूँ मैं।। आँधियों में उड़ चली, बूँदों के संग बह चली, नदियों की गोद में गिरी,  सागर में मैं समा गई।।  चुन-चुन के मेरी देह को,  जब आशियाने बन गए, तो हॄदय मेरा खिल गया। लगने लगा मुझे कि अब,  भाग्य मेरा बदल गया।। हर नींव में मैं बस गई,  पाषाण में मैं सज गई, पर काल क्रूर हाथों से,  जब आशियाने ढह गए। तो भाग्य मेरा रूठ गया, जो ख्वाब था वो टूट गया।। फिर दी गई उपमा मुझे,  उन बेजुबान घरौंदों की, जिन्हें कुछ लोग बनाते हैं। और समंदर की लहरों से, बिखरने को छोड़ जाते हैं।। पर बिखरने के भय से,  घरौंदे रुका नहीं करते, टूटने के भय से,  आशियाने झुका नहीं करते, मनुष्य ने रचा है जो, तो वक्त से ढहेगा वो।। मर कर भी मैं अमर रही,  क्योंकि मैं नश्वर नहीं। फिर आशियाँ बनाऊँगी,  घरौं...

पृथ्वी दिवस-अश्विनी गौड़

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज विश्व पृथ्वी दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षक बन्धु श्री अश्विनी गौड़ जी का लेख:- ----पृथ्वी दिवस---  'पृथ्वी की सतह से ऊपर जाने पर गुरुत्वाकर्षण बल कम होता जाता है।'      बस यूँ ही समझ लीजिये कि हम पृथ्वी की धरातलीय प्रकृति से जितना दूर जाएँगे हम पृथ्वी के प्रति अपने कर्तव्य से उतना ही विमुख होते जाएँगे। पर्यावरण को नजदीक से जानना, परखना और अनुभव करना हो, तो प्रकृति की प्रकृति को समझिए।   भूमि देवता,  पृथ्वी देवता, वसवो देवता, आदित्य देवता जैसे मंत्रों का जाप करते हमारे वेद पुराण सनातन काल से ही पृथ्वी दिवस मनाने की प्रेरणा देते आ रहे हैं।  सत्तर के दशक से अमेरिका पर्यावरण और पृथ्वी दिवस मनाने की कवायद कर रहा है जो कि सराहनीय पहल है, परन्तु क्या 22अप्रैल का दिन मना कर ही हम अपनी जिम्मेदारी इतिश्री कर लें?   आज अदृश्य वाइरस से पृथ्वी का सबसे बड़ा बुद्धिजीवी होने का दम्भ भरता मानव रक्त में ऑक्सीजन की हीमोग्लोबिन के साथ कमी से डरा-मरा पड़ा है।   ...

राम जी की महिमा-श्रीमती अनीता जोशी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज श्रीराम नवमी पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती अनीता जोशी जी की कविता:-  राम जी की महिमा आज राम मय सारा भारत, राम नाम की गूँज है।  राम नाम की महिमा गाते, राम नाम से प्रीत है।।  आज ब्रह्म भी बैठ कमल पर, अवधपुरी को गमन किया।  राम लला की देखी मूरत, श्री चरणों का ध्यान किया।।  कैलाश पति ने खुश हो कर के, डमरु से ये नाद किया। देख प्रभु की प्यारी मूरत, मन ही मन प्रणाम किया।।  ऋषि लोक से ऋषि मुनियों ने, मृत्युलोक को गमन किया। देख अवध का वैभव प्यारा, राम लला का ध्यान किया।।  आज भानू की प्रथम किरण ने, ज्योति राम की फैलाई।  मलयाचल की मलय पवन भी,  सुगन्ध राम की ले आई।।  आज चाँद भी कुछ चंचल था, रात चाँदनी थी बहकी। नवदीपों की सजी थी लड़ियांँ, अवधपुरी थी महकी महकी।।  मधुमास की मधुर पवन ने,  रामनाम की तान सुनाई। लगे नाचने मोर पपीहे,  भौरों ने गुँजार सुनाई।।  आज खुशी से सब झूमे है, राम लला का जन्म हुआ। राम नौमी का पावन ...

आओ पहुना मेरे द्वार-श्रीमती सविता विष्ट

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला *हिम मन मन्थन* में आज महाकुम्भ के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती सविता विष्ट जी की कविता:-  *आओ पहुना मेरे द्वार* कुम्भ बुलाए अबकी बार,  आओ पहुना मेरे द्वार, अद्भुत, अद्वितीय संस्कृति,  हमारी,सकल विश्व में छवि निराली।।  तरंगिणी की तरंगों में बसी,  जीवन की यह सच्चाई।  संजोग से हमने यह संजीवनी है पाई।।  भक्ति में लीन  सारी सृष्टि हुई है,  छोड़े हैं आज सबने घर-बार।  कुम्भ बुलाए अबकी बार,  आओ पहुना मेरे द्वार।।  मनमोहक मोहन की मुरली,  अर्जुन सा एकाग्रचित्त, एकलव्य सा शिष्य महान।  मेरे भारत की अनूठी पहचान।।  मेरे देश में हर घर मंदिर, पावन इसका कोना-कोना।  मन में बसी श्रद्धा अपार, जय-गंगे तेरी विरासत अपरम्पार।।  पहन भक्ति का चोला,  श्रद्धालु आज घर से है निकला।  मेल-मिलाप का सुन्दर सद्भाव, हाँ यही है जिस पर हमको है नाज।।  आस्था को फलने दो,  भक्ति को शक्ति बनने दो।  एकल को सकल  जगत बनने दो, कर लो पहुना मन ...

विश्व हीमोफीलिया दिवस-श्रीमती हेमलता बहुगुणा

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज विश्व हीमोफिलिया दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद टिहरी गढ़वाल शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा की  जी की कविता  विश्व हीमोफीलिया दिवस  हीमोफीलिया आनुवांशिक बीमारी,  जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है।  अगर चोट दुर्घटना हो जाती,  तो मृत्यु की सम्भावना रहती हैं।।  नहीं रुकता खून शरीर से,  खून बहता ही जाता है।  खून के न रूकने से ही,  यह जान लेवा हो जाता है।।  रक्त प्रोटीन की कमी के कारण, यह बीमारी हो जाती है।  यह बीमारी कुछ और नहीं,  क्लाॅटिंग फैक्टर कहलाती है।।  होती है यह बीमारी शरीर में,  थ्रोम्बोप्लास्टिन की कमी से।  नहीं जम पाता खून में थक्का,  थ्रोम्बोप्लास्टिन की कमी से।।  लक्षण तुम इसके पहचान लो,  जोड़ों में सूजन नाक से खून।  शरीर में पड़ते नीले धब्बे,   आँखों में दिखता है खून।।  करना है जब इसका इलाज,  देना बार-बार रूधिर आधार,  रिकॉम्बीनेंट क्लाटिंग फैक्टर,  चिकित्सक की परामर्श लेना।।...

आत्मविश्वास-डाॅ० गीता नौटियाल जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन डाॅ० गीता नौटियाल जी का  लेख:- आत्मविश्वास मानव-प्रयास हमेशा पशुता और चिन्ता की स्थिति से उठकर दिव्यता की ओर बढ़ने का होता है। यह प्रयास हमारी आत्मा का होता है मानव की संरचनात्मक स्थापना का वास्तविक तत्व इन्द्रियों, मन, बुद्धि, शरीर और आत्मा के बीच का सम्बन्ध है जिसका वर्णन कठोपनिषद् में बड़े सुन्दर ढंग से एक रूपक अतिशयोक्ति द्वारा किया गया है- आत्मानं रथिनं विद्धिं शरीरं रथमेव तु।  बुद्धिं तु सारथिं विद्धिं मनः प्रगहमेव च॥  इन्द्रियाणि हयानाहु विषयांस्तेषु गोचरान्‌।  आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥  इस प्रकार स्पष्ट है कि अपने आप को पहचानो रथ के स्वामी के रूप में और शरीर को सचमुच रथ समझो। बुद्धि को सारथी जानकर मन को यथा तथ्य लगाम (नियन्त्रण) मानो क्योंकि ये इन्द्रियाँ घोड़े हैं, इनके विषय रास्ते हैं। आत्मा अपने शरीर इन्द्रियों और मन के साथ मिलकर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर आनन्द की प्राप्ति करती है।  आत्मा, सम्पूर्ण चेतना का भाग है, जिस...

डाॅ० भीमराव अम्बेडकर-अश्रृत नक्षत्र

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज डाॅ० भीमराव जयन्ती के सुअवसर पर प्रस्तुत है जनपद पौड़ी छात्र अश्रृत नक्षत्र जी की कविता  डाॅ० भीमराव अम्बेडकर प्रतिवर्ष 14 अप्रैल अम्बेडकर जी को यादकर,  एक फोटो उनकी मेज पर रख माला पहना देते हैं।  जन्मदिन पर हम बातें तो बहुत सुनाते हैं,  लेकिन क्या उस युग-पुरुष की बातें जीवन में हम अपनाते हैं? जो अपमान व संघर्षों के रास्ते पर चलकर,  आजादी और आत्मसम्मान का महत्व हमें बताते हैं।  गौतम बुद्ध की शिक्षा को ग्रहण कर, कानून,आदि विषयों में 32 डिग्रियांँ पा जाते हैं।।  नौ भाषा का ज्ञान रख,मुद्रा व रूपये की समस्या,जाति का विनाश, भारत का संविधान आदि पुस्तकें लिख जाते हैं। मरणोपरान्त सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से,  31 मार्च 1990 को सम्मानित किए जाते हैं।।  नारी को गर्व से मस्तक ऊंँचा कर,  सम्मान से जीने का अधिकार दे जाते हैं।  लेकिन क्या हम उनकी बातें,  जीवन में अक्षरशः अपनाते हैं? उनके संविधान में बताए रास्ते पर हम,   सभी ईमानदारी से चलते जाएँ।  इसी उम्...

नववर्ष - श्रीमती मीरा भारद्वाज

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज नवसंवत्सरारम्भ के पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद हरिद्वार  से शिक्षिका बहिन श्रीमती मीरा भारद्वाज जी की कविता  नववर्ष मंगलमय हो!  चैत्र शुक्ल प्रतिपदा,  वर्ष हो शुभ सर्वदा।  द्वार पर आशीष माँ का,  शक्ति का भंडार है, शक्ति मर्म में निहित,  जीव का उद्धार है।।  चारित्रिक दृढ़ता अनूठी,  यदि नहीं, धिक्कार है, दृढ़व्रती सम्मुख ही जग में झुकता अत्याचार है।।  आत्मिक उत्थान का,  गुड़ी पड़वा ज्ञान है। अनुकूल हों प्रतिकूलता में,  प्रतिबद्धता सम्मान है।।  बो दिया हमने समय पर,  ले कनक आई बैशाखी।  अपना बोया काटते सब,  दे रहे संदेश रागी।।  उमंग उत्साह सम्पन्नता,  सांस्कृतिक उत्कर्ष हो, वैचारिक प्रखरता बढ़े कल्याणकारी वर्ष हो।।  शुभ सदा नववर्ष हो।।  डा०मीरा भारद्वाज (स०अ०)  रा० प्रा० वि० सलेमपुर-1 ब्लॉक-बहादराबाद,  हरिद्वार 🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

नव संवत्सर-एक आध्यात्मिक व वैज्ञानिक लेख - श्री हेमन्त चौकियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज नव संवत्सरारम्भ के पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री हेमन्त चौकियाल जी का हिन्दू नव वर्ष पर आधारित आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक लेख:- "सृष्टि में जीवन के प्रारम्भ का दिन है, सनातन परम्परा के नव संवत्सर का प्रथम दिन-चैत्र प्रतिपदा चैत्रमासे जगद् ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेSहनि। शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति।।  चैत्रमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे नवसंवत्सर का आरम्भ होता है, यह अत्यन्त पवित्र तिथि है। इसी तिथिसे पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण प्रारम्भ किया था। युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारम्भ भी इसी तिथि को हुआ था। इसी दिन सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्यने शकों पर विजय प्राप्त की थी और उसे चिरस्थाई बनाने के लिए विक्रम-संवत् का प्रारम्भ किया था। यह सनातन धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि इसकी हर परम्परा  के पीछे  कोई न कोई महान उद्देश्य छिपा रहता है और साथ ही छिपा रहता है विशुद्ध वैज्ञानिक तर्क।  सनातन परम्परा में हिन्दू धर्मावलम्बियों का नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा के दिन से...

12अप्रैल(इंटरनेशनल डे आॅफ ह्यूमन स्पेस फ्लाइट) - किरण जोशी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज इंटरनेशनल डे आॅफ ह्यूमन स्पेस फ्लाइट के सुअवसर पर जनपद टिहरी से शिक्षिका बहिन श्रीमती किरण जोशी जी की कविता: 12अप्रैल(इंटरनेशनल डे आॅफ ह्यूमन स्पेस फ्लाइट)    9मार्च 1934 का दिन शुभकारी था, माता-पिता और वह धरती भी खुश हुई। यूरी गागरिन जन्मे थे बहुत प्रतिभा शाली, किन्तु बचपन से ही कष्ट मिले थे उनको भारी।।  उन दिनों ही द्वितीय विश्व युद्ध छिड़ा था, वो नन्हा  यूरी 6 वर्ष का डरा हुआ था। माँ की गोद से देखता, नष्ट होते संसार को,  घर भी छीना, झोपड़ी में सोना मजबूर हुआ था।।  किन्तु कष्ट उनके हौसले को कम न कर पाअ,  पढ़ता भी गया 16 वर्ष में फाउड्री मैन के रूप बढ़ता।  गणित प्रिय था पर अन्य विषयों की बहुत की पढ़ाई,  रोचकता से पढ़ ली पृथ्वी के बाहर की   जानकारी।।  बड़े हुए 1955 में कास्टिंग टैक्नोलॉजी में निपुण हुए,  12अप्रैल को वोस्ताक से धरा का चक्कर पूरा किया।  आउट स्पेस पहुँच प्रथम अन्तरिक्ष यात्री का नाम हुआ,  12अप्रैल दुनिया में ह्यूमन स्पेस फ...

हमारी शिक्षा का आधार आध्यात्मिकता-माधव सिंह नेगी

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रस्तुत है आज जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षक  श्री माधव सिंह नेगी जी का आध्यात्मिक शिक्षा पर आधारित लेख हमारी  शिक्षा का आधार -आध्यात्मिकता किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था उस देश के सामाजिक एवं साँस्कृतिक दर्शन, पर्यावरण तथा उस समाज के मानव जीवधारियों के विषय में व्याप्त अवधारणाओं पर निर्भर करता है। साथ ही साथ जीवन-यापन के लक्ष्यों को समाज किस क्रम एवं सापेक्षित महत्ता से देखता है, यह भी उस देश की शिक्षा नीति को प्रभावित करता है। आज समाज की आवश्यकताएँ बदल गयी हैं। तो शिक्षा व्यवस्थाएँ भी परिवर्तित हो चुकी हैं।  शिक्षा नीतियों में महत्वपूर्ण स्थान पर तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी ने अपना वर्चस्व बना लिया है। लेकिन भारतीय संस्कृति में मानव की संकल्पना केवल उसके शरीर, उसके विकास तथा सम्बन्धित व्यापारों तक ही सीमित नहीं है। यहाँ के साहित्य, दर्शन एवं धर्म ग्रन्थों में बालक को एक आध्यात्मिक सत्ता के रूप मेंं स्वीकार किया गया है, तथा इस बात की सम्भावना में विश्वास व्यक्त किया है कि प्रत्येक व्यक्ति में चैत्य-पुरुष तथा अन्तरात...