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बस्ते की आश - श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी की कविता :- बस्ते की आश आज पुन: मैं बस्ते के पास गया, मुझे देख बडे़ अन्दाज से मुस्कुराया। मैंने पूछा आज बहुत खुश हो भाई, बोला, क्या! तुमको कोई खबर नहीं आई।।  मैंने भी अन्दाज से कहा बताओ भाई,  ऐसी कौन सी खबर है जो खुशी है समाई।  बस्ता बोला खबर बहुत ही है मजेदार,  जिसे सुन आपको भी होगी खुशी अपार।।    मैंने सुना कैबिनेट से राज्य को आया है फरमान, यह सुनकर मेरे भी मन में जगे कई अरमान। दो अगस्त से स्कूल खुलेंगे यह सुन मन हर्षाया, तुमको भी मैंने संग पूर्व तैयारी हेतु है जगाया।।  अब लग रहा है ये मुसीबतें टल जायेंगे,  हम-तुम बड़ी खुशी से स्कूल जायेंगे।  और फिर से मिल स्कूल की रौनक जगायेंगे,  गुरुओं से मिलकर हम पहले जैसा ज्ञान पायेंगे।। 🙏रचना देवेश्वरी सेमवाल (स०अ०) रा० उ० प्रा० वि० कान्दी ब्लॉक- अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

सावन की फुहार - श्रीमती श्रीमती लता आर्य

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती लता आर्य जी की कविता :- सावन की फुहार इधर-उधर फिरती रहती, हर बूँद फूलों पर गिरती।। ये सावन की बूँदों की फुहार, जब बरसे कहीं डर तो कहीं बहार।। अपना रंग फूल खिलाते,  फूल उसे बहुत लुभाते। जिसको मेघ लगे डराने, वही फूल लगे लुभाने।। ये सावन के बूँदों की फुहार, जब बरसे कहीं डर तो कहीं बहार।। सावन दे सन्देश,  चलो मत ऐसी चालें,  जिससे संगी-साथी छूटें।  आँखों में भरे आँसू, मोती की माला टूटे।। ये सावन की बूँदों की फुहार। जब बरसे कहीं, डर तो कहीं बहार।। मधुर रस, रंग-बिरंगी तितलियाँ। ऐसे मिलो जैसे मधुवन की लड़ियाँ। करें नृत्य सावन में मन लुभावन मोर, देख-देख रंग बिरंगी तितलियाँ करे शोर।। मै रहूँ इस आँगन में हर बार, तू आकर जल्दी क्यों जाये,  सावन की फुहार। ये सावन के बूँदों की फुहार, जब-जब बरसे,  कहीं डर तो कहीं बहार।। 🙏 रचना :- श्रीमती लता आर्य (प्र०अ०) रा० प्रा० वि० मनोरा वि० ख०-भीमताल जिला- नैनीताल उत्तराखण्ड 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

बस्ते की व्यथा - श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग  से शिक्षिका बहिन श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी की कविता :- बस्ते की व्यथा    आज मैं यूँ ही बस्ते के पास गया,  थोड़ा उसका भी मैंने हाल सुना।  बोला भाई, अब तुम्हें मेरी सुध आई,  अरे ! एक साल से ले रहा हूँ अंगड़ाई।।  बस्ता बोला जीवन का यह पल बेहाल, तूने भी नहीं पूछा कभी मेरे हाल-चाल।  एक साल से पड़ा हूँ लावारिस जैसा,  तूने भी न सोचा हालचाल है कैसा।।  देख पड़ा हूँ मैं किस तरह से मैला,  बन रखा हूँ बस कूड़ेदान का सा थैला।  बस कभी मेरी भी सुध ले लो भाई,  मुझे तो हर पल तेरी याद आई।।  मैंने भी आज प्यार से गोद में लिया,  उसके दिल का हाल मालूम किया।  भाई आज समय विकट आया है,  हर कोई मुसीबतों में समाया है।।  एक दिन जरूर अच्छा आएगा,  यह मुसीबत का पल गुजर जाएगा।  फिर से हम, तुम सब रूबरू होंगे,  और हमारे स्कूल के दिन भी लौटेंगे।।  फिर हम, तुम सब साथ होंगे,  हाथों में हमारे हाथ होंगे।  हम, तु...

बस्ता - श्रीमती रेखा रावत जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग  से शिक्षिका बहिन श्रीमती रेखा रावत जी की कविता :- *बस्ता* कल यूँ ही वो मुझसे बोला,  मन का राज यूँ उसने खोला।  भाई मुझे एक बात बता ! है तूझे कुछ अता-पता?   पिछ्ले एक साल से तूने,  मुझसे बात नहीं की प्यारी।  ना तेरी पीठ पर बैठ कर,  मैंने की है कोई सवारी।। देख कैसे मैं पढ़ा हूं मैला,  ऐसा वैसा बन गया हूंँ थैला।  कभी तो मेरी सुध ले यार,  नहीं तो माँ से पड़ेगी मार।। मैं उठा बस्ते के पास गया,  उसे प्यार से गोद बिठाया।  दोस्त ! ऐसा ही समय है आया,  हम सब पर एक संकट है छाया। फिक्र न कर एक दिन आयेगा,  जब ये संकट छँट जायेगा।  तू करेगा फिर से मेरी सवारी,  और बातें भी होंगी प्यारी-प्यारी।।  फिर हम चारों होंगे साथ,  हाथों में होंगे फिर हाथ।  तुम, मैं और कलम दवात,  रबड़, पेन्सिल, कॉपी, किताब।। 🙏 रचना:-      रेखा रावत(स०अ०)       रा० प्रा० वि० तिमली भरदार  ब्लॉक- जखोली, जनपद-...

बरसात - श्रीमती सन्नू नेगी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद चमोली  से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी की कविता :- बरसात तप रही धरा ताप से, अकुला रही थी भाप से। टप-टप गिरती बूँदें, भिगो रही बरसात से।। झुलस रहे थे विटप, बढ़ रहे सरपट वे। रिक्त हुए थे जल संचय, भर रहे झटपट वे।। हाथ माथे रख बैठा किसान, खेत खलिहान भाग रहा। बाली थी तड़फ रही, जीवन्त होते देख रहा।। निर्जल हुई धरती पर, कंकड़ आँखें थे देख रहे। बरखा की बूँदें उन पर, चादर हरी बिछा रहे। बन्द पड़े थे छाते, इन्द्रधनुष सम हो गए। फुदक-फुदक युगल संग, बरखा के हो गए।। झम-झम आती बारिशें, तन-मन भिगो रही। प्रेम मिलन की ख्वाइशें, नव युगल को बुला रही।। 🙏 रचना :- सन्नू नेगी (स०अ०) रा० क० उ० प्रा० वि० सिदोली वि०ख०- कर्णप्रयाग, चमोली उत्तराखण्ड 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

कारगिल विजय दिवस - श्रीमती ललिता जोशी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में कारगिल विजय दिवस पर प्रस्तुत है जनपद पिथौरागढ़ से शिक्षिका बहिन श्रीमती ललिता जोशी जी की कविता :- 🇮🇳कारगिल विजय  दिवस🇮🇳 26जुलाई कारगिल विजय दिवस, भारत का महत्वपूर्ण दिन बना महान। उद्देश्य इस पावन दिन का, मिले शहीदों को सम्मान।। उग्रवादियों ने नियन्त्रण रेखा को, पार करने का किया प्रयास। पाकिस्तानी भी इसमें शामिल थे, भारतीयों को हुआ इसका आभास।। बीच पाक-भारत सेना के, साठ दिनों तक युद्ध हुआ। छब्बीस जुलाई उन्नीस सौ निन्यानबे, महायुद्ध यह ख़त्म हुआ।। भारतीय सेना ने पाक के, कब्जे वाले स्थानों पर हमला किया। विजयी भारत ने फिर पाक सेना को, सीमा पार जाने को मजबूर किया।। 🙏 रचना:- ललिता जोशी (स०अ०) रा० उ० प्रा० वि० पुगौर वि० ख०- मूनाकोट, पिथौरागढ़ 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

कारगिल विजय दिवस - श्रीमती वंदना जोशी

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद चम्पावत से शिक्षिका बहिन श्रीमती वन्दना जोशी जी की कविता :- 🇮🇳कारगिल विजय दिवस  26 जुलाई कारगिल विजय दिवस पर, भारतीय सैन्य शक्ति को शत-शत नमन। उनके असीम शौर्य, अदम्य साहस को, अर्पित करते हम सब श्रद्धा सुमन।। देश की रक्षा व सुरक्षा की  खातिर, न्यौछावर कर दिया अपना तन-मन। नहीं भुला सकते इनकी शहादत, ये हिन्दुस्तान का अनमोल धन।। देश-प्रेम से अभिभूत सैनिकों ने, छोटी उम्र में सर्वस्व किया अर्पण। परिजनों को दुख है असमय विछोह का, जिन्दा रहने की ताकत है इनका समर्पण।। फक्र है हमें, बलिदान भुला न पायेंगे, नतमस्तक है  राष्ट्र का जन-जन। शब्दों में ना पिरो सकते वीर गाथा, सैनिकों की कुर्बानी से जिन्दा आज वतन।। 🙏 रचना:- वंदना जोशी (स०अ०) रा० आ० उ० प्रा० वि० पऊ वि०ख०- लोहाघाट जिला- चम्पावत 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

गुरु महिमा - श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी की कविता :- गुरु महिमा ज्ञान मिले, फल मिले, मिले सहारा, हटे अज्ञानरूपी जीवन का हर अँधेरा।  सद्भाव मिले, सद्विचार मिले हर पल,  गुरु की महिमा से जीवन सुखद बना हरपल।।  जीवन की सफलताओं का हर पल,  गुरु की महिमा से रहा सदा सफल।  गुरु से मिला जीवन मूल्य का प्राण,  बस गुरु से ही हमारे जीवन की शान।।  हमारी अज्ञानता को नया रूप देते हैं,  हमारी नादानियों को नयी समझ देते हैं।  हमारे मन में ज्ञान का दीपक जलाते हैं,  बस हमें अपनी कृपा से जीना सिखाते हैं।।  बचपन के गुरु माँ-बाप की छाया,  बड़े होकर अपने गुरुजनों की छाया।  जीवन की नेकी का एक सुन्दर पल पाया,  मैंने इनकी महिमा से जीवन को सुदृढ़ बनाया।।  🙏 रचना देवेश्वरी सेमवाल (स०अ०) रा० उ० प्रा० वि० कान्दी वि० ख०- अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

गुरु की महिमा - श्रीमती हेमलता बहुगुणा

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में गुरु पूर्णिमा पर प्रस्तुत है जनपद-टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी की कविता :- गुरु महिमा गुरु की महिमा होय असीमा, जिसकी व्याख्या की न सीमा। अन्धकार में होई उजियारा, उबड़-खाबड़ में होय सहारा।। अन्धे की वो आँख कहलाये, बहरे गुरु गुन सब बतलाये। लँगड़ा ज्ञान की दौड़ लगाये, गुरु गुण कोई लिख न पाये।। गुरु ज्ञान है अपरम्पारा, सच्चे गुरु का मिले सहारा। फँसे जाल में झट सुलझाये, जीवन का हर सार बताये।। गुरु को ईश्वर ने भी माना, भगवन से गुरु श्रेष्ठ ही माना। सतगुरु सत् सत्य का ज्ञान, गुरु ही जग में बड़ा महान।। गुरु पूर्णिमा विष्णु प्रिय है, गुरु महिमा तो जगत प्रिय है।। 🙏 रचना :- हेमलता बहुगुणा (पूर्व प्र०अ०) रा० उ० प्रा० वि० सुरसिंहधार  ब्लॉक-चम्बा, टिहरी गढ़वाल 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

चन्द्रशेखर आजाद - श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आजाद जी की जयन्ती पर प्रस्तुत है जनपद-टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी की कविता :- 🙏चन्द्रशेखर आजाद 23 जुलाई 1906 को, भारत भूमि पर जन्म लिया। नाम चन्द्र शेखर आजाद, भारत का वीर सपूत हुआ।। आजाद हूँ, आजादी की मैं, देश में अलख लगाता हूँ। आजादी से रहना चाहता, आजादी ही देश में चाहता हूँ।।   सुन आजाद की बातों को, अंग्रेज को गुस्सा आ गया। सोलह साल के बच्चे को, उसने डण्डे से पिटवाया।। डण्डे खाकर बाहर आया,  इन्कलाब का नारा लगाया।  देश को आजाद कराने का,                     नया डंका फिर से बजाया।। अंग्रेजों के छक्के छूट गये, उसको पकड़ न पाये। नये-नये रूप में उसको, अंग्रेज भी पहचान न पाये।। दुश्मन के पास न ऐसी गोली, जो आजाद को मार गिराए। घिर गये जब दुश्मन के चंगुल में, तब अपनी गोली आजाद कराए।। ऐसे देश भक्त योद्धा थे वो, देश के लिए कुर्बान हुए। 29 फरवरी 1931 के दिन, अमर हुए आजाद हुए।। 🙏 रचना :- हेमलता बहुगुणा (पूर्व प्र०अ०) रा० उ० प्रा० वि० सुरस...

राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस - श्रीमती वन्दना जोशी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में राष्ट्रीय ध्वज अंगीकरण दिवस पर प्रस्तुत है जनपद-चम्पावत से शिक्षिका बहिन श्रीमती वन्दना जोशी जी की कविता :- 🇮🇳राष्ट्रीय झण्डा अंगीकरण दिवस  जिन्होंने बाँध दिया देश को, एकता की आकर्षक ध्वज से। याद करें उस महापुरुष को, सम्मान, कृतज्ञता के भाव से।।  पिंगली वैंकेया ने तैयार किया, भारत के राष्ट्र ध्वज तिरंगे को। प्रतिवर्ष 'ध्वज अंगीकरण दिवस,' मनाया जाता 22 जुलाई को।।  आन्ध्रप्रदेश के मछली पट्टम में जन्मे, स्वतन्त्रता सेनानी व कृषि विज्ञानी। सभी देशों के रंग-बिरंगे झण्डे देख, अपने राष्ट्र ध्वज को बनाने की ठानी।।  लाल, हरा और सफेद रंगों को चुनकर, चौबीस तिल्लियों वाला अशोक चक्र लिया। अपने निरन्तर प्रयासों से देश को, मनभावन सुन्दर तिरंगा झण्डा दिया।।  बहुमुखी प्रतिभा के अथाह सागर, जापानी भाषा के ज्ञाता जापानी वैंकेया। सूती कपड़े पर निरन्तर शोध किया, जाने गए जग में पट्टी या कॉटन वैंकेया।।  अनुपम राष्ट्र ध्वज की रचना करके, जग में अमर हो गए झण्डा वैंकेया।।  🙏 रचना:- वन्दना जोशी (स०अ०) रा० क० आ० उ० प...

नई तालीम-डाॅ० विनोद कुमार यादव जी

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद - रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी प्रवक्ता डायट डाॅ० विनोद कुमार यादव जी का शैक्षिक लेख :- नई तालीम तीव्र परिवर्तनों के वर्तमान दौर में ग्रामीण क्षेत्र नवीन चुनौतियों का समाना कर रहा है। सरकार ग्रामीण क्षेत्र को शहरी क्षेत्र के बराबर लाने के लिये कृत संकल्प है। इसके लिए वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों तथा परिवर्तन के अन्य कारकों को सम्मिलित रूप से प्रयास करने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्र की वर्तमान आवश्यकताओं पर ध्यान देने व ग्रामीण क्षेत्र के विकास कार्यक्रमों पर दृष्टिपात करने से, यह लगता है कि आज ग्रामीण क्षेत्र में सामाजिक सक्रियता कार्यक्रमों तथा सामाजिक नेतृत्व व संस्थागत क्षमता को मजबूत करने की अत्यन्त आवश्यकता है। यहाँ यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि इस तीव्र परिवर्तन से कहीं ग्रामीण क्षेत्र का सामाजिक ताना-बाना ही छिन्न-भिन्न न हो जाये। साथ ही ग्रामीण जनता में विभिन्न कौशलों को विकसित करते रहने का भी सतत् प्रयत्न करते रहना होगा तथा हो रहे परिवर्तनों के सन्दर्भ में लोगों का सही दृष्टिको...

प्यारे, बच्चों! करो पढ़ाई - श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी की कविता  :- प्यारे, बच्चों ! करो पढ़ाई  प्यारे, बच्चों ! करो पढ़ाई,   इससे दिल न चुराना तुम।  आॅनलाइन या आॅफलाइन  दिल लगा कर पढ़ना तुम।।  हिन्दी, अंग्रेजी भी पढ़ना,  विज्ञान, गणित भी पढ़ना तुम।  अगर कहीं पर समझ न आए,  अपने गुरुजी  से पूछ्ना तुम।।       राम, कृष्ण ने भी शिक्षा ली,   अपने-अपने गुरुओं से।  गीता मर्यादा का ज्ञान दिया,   गुरु के आशीर्वाद से।।     जो पढ़ाई में ध्यान लगाये,  वो आगे बढ़ता जाता है।  अच्छी शिक्षा के कारण ही,  वो महान कहलाता है।।         रोज-रोज दो घड़ी तुम पढ़ लो,  कहानी महापुरुषों की पढ़ लो।  बढ़ता जाएगा हर ज्ञान,  शिक्षा से ही जग की शान।।  पढ़ाई से अच्छा नेता बनोगे,  पढ़ाई करो वैज्ञानिक बनोगे।  पढ़ाई आये हर समय काम,  करो पढ़ाई बनो महान।।  ...

धरा का रूप अनोखा - श्रीमती सुषमा नौटियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद- देहरादून से शिक्षिका बहिन श्रीमती सुषमा नौटियाल जी की कविता  :- *प्रकृति "धरा का रूप अनोखा"* इस धरा का है रूप अनोखा, ये धरती है एक झरोखा।। कहीं दिन सुन्दर रूप छटा है, कहीं रात अनोखी काली घटा है।। कभी सावन की मतवाली घटा है, कभी जून तपती धरा है। ये धरा है एक स्वप्निल झरोखा, इस धरा का है रूप अनोखा।। कभी सुन्दर वसन्ती प्रसून खिले हैं, कभी धरा पर नुकीले शूल उगे हैं। सावन भादों की फुहार यहाँ है, तो वासन्ती मनुहार भी यहाँ है।। आश्विन, कार्तिक की फसलें लहलहातीं, धरती सुत की बाछें खिल जाती। मई, जून की गरमी तड़पाती, दिसम्बर, जनवरी की ठण्ड कँपकपाती।। कभी कल-कल छल-छल बहते गाद, गदेरे, तो कभी सूखी धूल के बादल घनेरे। कभी चौमासे की खूब हरियाली है, कभी ग्रीष्म की रूखी बदहाली है।। कहीं बाग-बगीचे खुशहाल खड़े हैं, तो कहीं खण्डहर सुनसान पड़े हैं। कहीं घटा है शोला शबनम, कहीं धरा का है रूप अनुपम।। पक्षियों की खूब चहचहाट यहीं है, तो निर्जन वनों की चरमराह...

प्रकृति को समझें - श्रीमती पुष्पा तिवारी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद-चम्पावत से शिक्षिका बहिन श्रीमती पुष्पा तिवारी जी की कविता  :- प्रकृति को समझें   प्रकृति को सब समझें, हो शुद्ध वातावरण। रहे स्वस्थ शरीर, गाँव, मोहल्ला, समाज, देश, राष्ट्र।। स्वस्थ विचार बने, स्वर्ग से सुन्दर हो धरा। ना रहे कोई तनाव, ना कोई भेदभाव।। धरा-धाम में हो हरा ही हरा, खेत-खलिहान सब हों भरा-भरा  धरा, तुम ही तो है सब की मांँ, पालन हारी, तुझे प्रणाम माँ।। देखो धरा से सीखो कितनी पावन, देखो अपनी गोद में लेकर करती पालन, हम भी तो बने, उनकी जैसे। सोच विचार कर लो मन में।। ठान लो मन में, कर लो निश्चय, कर लो संकल्प, यही बात मुझे बताना। धारा जैसा महान बने, यही संकल्प हमारा।। 🙏रचना :-  पुष्पा तिवारी (स०अ०)  रा० उ० प्रा० वि० आमबाग  टनकपुर, चम्पावत 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

कृतज्ञता का पर्व हरेला-श्री हेमन्त कुमार चौकियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री हेमन्त कुमार चौकियाल जी का लेख :- प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है हरेला 🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳🌳 भारतीय सनातन परम्पराओं की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि हर पर्व या उत्सव के पीछे जहाँ एक ओर कोई सन्देश छिपा होता है तो, दूसरी तरफ, उसके पीछे विशुद्ध वैज्ञानिकता के साथ कृतज्ञता का भाव भी समाहित होता है। हरेला भी एक ऐसा ही पर्व है जिसमें सुख, समृद्धि और सम्पन्नता की कामना के साथ प्रकृति पूजन के साथ प्रकृति के प्रति उसके द्वारा प्रदत्त सेवाओं के लिए कृतज्ञता ज्ञापन का भाव भी समाहित है। आषाढ़ मास के बाद सावन मास के प्रथम दिन को कर्क संक्रान्ति भी कहते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायण का पथ समाप्त कर दक्षिणायन हो जाते हैं और दिन क्षणिक उत्तरोत्तर रूप से छोटे और रातें लम्बी होने लगती हैं। सूर्य के दक्षिणायन होने से ठीक दस दिन पहले हरेला बोया जाता है।  आइए जानते हैं क्या है हरेला इसके लिए...

हरेला त्योहार मनायें - श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद- टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी की कविता  :- 🌾हरेला त्योहार मनायें🌾 हरेला का त्योहार मनायें, जन-जीवन सुखमय हो जाये।  धन-धान्य   समृद्धि आवे, नौ बीजों से जौ-जस पावें।।    शिव-शक्ति की पूजा करके, घर-घर सुख-शान्ति लावें। हरेला का  त्योहार  मनायें, जन-जीवन सुखमय हो जाये।।  हरियाली का यह त्योहार, चैत्र, अाश्विन, श्रावण के मास। फसल धरा में खूब उपजेगी, कृषक की है  इसमें आस।।  हरेला का त्योहार मनायें, जन-जीवन सुखमय हो जाये। धरती में हरियाली छाये, पशु-पक्षी इसमें पल जायें।।  खेतों में फसलें लहरायें, जन-जन प्रभु का आशीष पावें। हरेला का त्योहार मनायें, जन-जीवन सुखमय हो जाये।।  🙏 रचना -   हेमलता बहुगुणा (प्र०अ०)    रा० उ० प्रा० सुरसिंहधार ब्लॉक - चम्बा, टिहरी गढ़वाल 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

प्रकृति के रूप - श्री माधव सिंह नेगी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री माधव सिंह नेगी की कविता  :- प्रकृति के रूप  🌳🌳🌳🌳🌳 प्रकृति ममतामयी माँ है, प्रकृति हमारा पोषण करती है। प्रकृति हमें सुरक्षा कवच देती है,  प्रकृति से यह सुन्दर धरती बनती है।।  प्रकृति अग्नि, प्रकृति वायु है, यह जल, जमीन और आकाश है।  प्रकृति बिना हम इस धरा धाम पर, रहने के काबिल नहीं हैं।।  प्रकृति के कई रुप हैं,   प्रकृति पेड़, जंगल, नदी, बारिश है। प्रकृति तालाब, मौसम, वातावरण है, पहाड़, पठार, रेगिस्तान, झरने सागर है।।  कुदरत का हर रूप शक्तिशाली है,  प्रकृति का हर स्वरूप अद्भुत है,  प्रकृति कभी धूप है, कभी छाँव है। प्रकृति कभी सुनहरा दिन है, तो कभी चाँदनी रात है।। कभी सुबह और कभी साँझ है, कभी कल, परसों व कभी आज है। कभी बादल, कभी बरसात हो, तुम ईश्वर का अद्भुत प्रसाद हो।। कभी मोहक बसन्त, कभी तपती ग्रीष्म हो, कभी वर्षा, शरद, हेमन्त कम्पकपाती शीत हो। प्रकृति तुम दिन,...

गीत - श्री दीवान सिंह कठायत जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद- पिथौरागढ़ से शिक्षक साथी श्री दीवान सिंह कठायत जी की कुमाऊँनी लोक भाषा में कविता  :- गीत आज पहाड़ा बेचीणौ, यो धुरा बेचीणौ,  गध्यारा बेचीणौ, गौं घर बेचीणौ।  सरकारा तू काम कर पहाड़ा बचूँणौ,  भू कानून येति ल्याजा थाता सेंत्योंणौ।। बचा लियो आपणौ मुलुक देवभूमि अपार, नी जाणि दियो इसिकै परायों का हाथ। टका में बेची बे, हाथों है जाइ बे,  गौचर बेची बे, पनघट देइ बे।। नी रौलौ रंगिल कत्यूर, मुनस्यार सुकिलौ,  सरकारा तू काम कर पहाडा़ बचूँणौ।  मनखो अपणि माटि की यो सुणि लियो पुकार,  नी करो मोल पराइ हाथों बचाओ रीत त्यौहार।। डाइ बोटि नी रौला, वों कंक्रीट उगाला,  बोलि भाषि नी रौला, घुघुती नी घोला। नी होलो जागरा इष्ट देवों को,  सरकारा तू काम कर पहाड़ा बचूँणौ,  भू कानून येति ल्याजा थाता सेंत्योंणौ।। 🙏 रचना :- दीवान सिंह कठायत (प्र०अ०)  रा० आ० प्रा० वि० उडियारी  बेरीनाग, पिथौरागढ़ 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

हरियाली फैलाओ - डाॅ० आभा भैंसोड़ा

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद- नैनीताल से शिक्षिका बहिन डाॅ० आभा  भैंसोड़ा जी की कविता :- ☘️🌲🌱🍀🌿🌴 हरियाली फैलाओ  हरियाली को फैलाना है, लक्ष्य जीवन का ये बनाना है। क्षरण हुआ जाता प्रकृति का, नाश ईश की अनुपम कृति का।। जन जन को संदेश पहुँचाना, जल, जमीन, जंगल है बचाना। रख हरे-भरे आँगन की चाहना, प्रकृति संदेश जग में फैलाना।।  प्राण शक्ति है प्रकृति, बचाना, तभी सरल हो जीवन सजाना। हर हाल पेड़ों को मित्र बनाना, जीवन का तुम ये उद्देश्य बनाना ।। एक पेड़  काटोगे अगर  तुम, दस पेड़ों को पहले उगाना। भरपूर ऑक्सीजन मिले सभी को,  कर्म कुछ ऐसे तुम कर जाना।। अपनी भावी पीढ़ी को तुम,  धन सम्पदा भले ही ना दे जाना। उनके स्वस्थ जीवन के हेतु  प्राकृतिक विरासत बचा कर जाना।। 🙏रचना :-  डाॅ० आभा सिंह भैसोड़ा (स०अ०) रा० प्रा० वि० देवलचौड़ हल्द्वानी, नैनीताल 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

महामारी से बचाव - श्रीमती अरुणा राज

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद- टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती अरुणा राज  जी की कविता :- महामारी से बचाव  अजी घर से बाहर नहीं जाइयेगा,  वरना मुसीबत में पड़ जाइयेगा। जरा बात मेरी समझ जाइयेगा,  समझकर जरा गौर फरमाइएगा ।।     अजी घर से बाहर...   जरा भीड़ से बचकर चलो तो मैं मानू ,  बेवजह घर से बाहर न निकलो तो जानू। अगर हो सके तो ठहर जाइयेगा,  ठहर कर जरा बात दोहराएगा॥    अजी घर से बाहर...  हाथों को धुलते रहोगे जो हरदम,  और मुँह को ढककर चलेंगे जो हम तुम। तो ही बीमारी से बच पाइएगा,  यही बात लोगों को समझाइयेगा ।।  अजी घर से बाहर...  अभी तक तो इसकी सटीक दवा भी नहीं है,  केवल बचाव और सावधानी ही है । जरा लोगों को ये भी बतलाइयेगा,  कि घर से ही कामों को निपटाइयेगा ।।  अजी घर से बाहर...   🙏रचना :-   अरुणा राज (प्र०अ०)  रा० प्रा० वि० जिवालाखाल वि०ख०- कीर्तिनगर जनपद-  टिहरी गढ़वाल 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

बच्चों की यादें - श्रीमती गंगा आर्य जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद- पिथौरागढ़ से शिक्षिका बहिन श्रीमती गंगा आर्य जी की कविता :- बच्चों की यादें अरसे बाद आज स्कूल गई तो, बच्चों तुमको वहाँ ना पाया। तुम सबकी नटखट बातों ने, आज मुझको बहुत सताया।। हर कमरे का हर कोना, देखो आज वीरान पड़ा है। तुम सबके बिन प्यारे बच्चों! विद्यालय आँगन सूना पड़ा है।। आज किसी ने ना घेरा मुझको, ना किसी ने स्वागत किया मेरा। यादों ने तुम्हारी बहुत छेड़ा मुझको, मायूसी ने घेरा मुझको।। नजरें बार-बार ढूँढ रही थी तुमको, काश तुम्हारी टोली आ जाती। फिर से करते हम वही मौज मस्ती, विद्यालय में वही रौनक आ जाती।। किसको बोलती संग आकर खेलो? किसको बोलती सुनो कहानी? बगिया से मेरे आज पुष्प नदारद थे, माली की आँखों में झरझर बह रहा था पानी।। मिल जाते अगर तुम मुझको, गले लगाती तुम सबको। लम्बे अरसे की आप बीती, सुनती और सुनाती तुमको।। तुम सबकी यादों ने आज, बहुत सताया, बहुत रुलाया। सूना पड़ा है विद्यालय आँगन, सूना पड़ा है विद्यालय भवन।। अब और नहीं होता सहन, उचित दूरी का करके पालन।   देखो हम आ रहे हैं तुम्हारे द्वार, ब...

विश्व जनसंख्या नियन्त्रण दिवस - श्री हरीश कोठारी

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में विश्व जनसंख्या नियन्त्रण दिवस पर प्रस्तुत है जनपद-पिथौरागढ़ से शिक्षक साथी श्री हरीश कोठारी जी की कविता :- 🌍विश्व जनसंख्या नियन्त्रण दिवस  आज नहीं तो कल को, निश्चित होगी हाहाकार। अगर नहीं रखा हमने, सीमित अपना परिवार।। खाने को नहीं भोजन होगा, पीने को नहीं पानी। भूखे बच्चे चिल्लायेंगे, याद आ जायेगी तब नानी।। फसली खेत काटकर, बन गए सुन्दर भवन निराले। जमकर कर ले भोजन बन्दे, पड़ने वाले हैं फिर लाले।। जिस गति से कट रहे हैं, जंगल, आएगी तबाही। नहीं बचेगा तू भी, मानव देने को गवाही।। जहाँ एक वहाँ हुए इक्यावन, ऐसे बढ़ी है संख्या। अभी न जागे कब जागोगे? जब बेकाबू होगी जनसंख्या।। न होगा पानी न होगा भोजन, ना ही मिलेगा आॅक्सीजन। ना कपड़ा ना बिस्तर होगा, आने वाला है वो दिन।। समय रहते सम्भल जा बन्दे, बचा ले अगली पीड़ी को। एक ही नारा बना जीवन में, हम दो हमारे दो।। 🙏 रचना :- हरीश कोठारी (स०अ०) रा० उ० प्रा० वि० ग्वाड़ी वि०ख०- गंगोलीहाट, जनपद- पिथौरागढ़ 🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

शिक्षक की तो गयी मजा- श्रीमती हेमलता बहुगुणा

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी की कविता :- 📝शिक्षक की तो गयी मजा जब बच्चे स्कूल में आते, उनसे पहले शिक्षक आते। प्रार्थना बच्चों से करवाते, एक लय में उन्हें बताते।। पाटी पेन से लेख लिखायें,  तब आता है मजा ही मजा।  पत्रकार भैया भी लिख जायें,  शिक्षक की तो गयी मजा।।  प्यार प्रेम की थपकी देकर, शिक्षा की ओर उसे बढ़ाये। खेल सिखाये, खेल बताये, सब खेलों के नियम बताये।। महामारी में ड्यूटी निभाये, आॅन लाइन बच्चों को पढ़ाये।  रसोइया, डाक्टर, नर्स बन जा, पत्रकार भैया बोले शिक्षक की तो गयी मजा।।  विभागीय कार्य को निभाये,  एस०एम० सी० की मीटिंग कराये। ऐसे अनेकों कार्य निभाये, फिर पत्रकार भैया क्या चाहे? मिशन शिक्षा में भागीदारी, शिक्षण को रूचिकर बनाये। योगा क्राफ्ट कला प्रदर्शनी, सबमें आगे उन्हें बढ़ाये।। हर गुणवत्ता से है सजाये, फिर भी नजर क्यों न आए?   हर निखार बच्चे में लाये, पत्रकार भैया अधिकारी बन जाये।। कलाकार की कलाकृतियाँ, हास्यकार की हास्य-व्यं...