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महिला महिमा - श्री मनोज घिल्ड़ियाल जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद-पौड़ी गढ़वाल से शिक्षक साथी श्री मनोज घिल्ड़ियाल जी की कविता- 🙏✍️महिला महिमा सूरज से भी पहले जग जाती, सबको बिस्तर पर चाय पिलाती। खिचड़ी-दलिया, नाश्ता खिलाती, टिफिन बना बच्चों को तैयार कराती।। झाड़-पोंछकर सारा घर, बर्तन भाण्डे कपड़े धो कर। गाय-कुत्ते का भाग निकालकर, तब स्नान ध्यान कर स्वयं वो खाती।। बिजली-पानी के बिल भरकर, फल-सब्जी लेकर वापस आती। बच्चों की पसन्द का खाना बनाती, संग शाम की वो तैयारी करती।। सदका उतार शनि दान करती, भक्तिभाव से उपवास करती। न हो क्लान्त,  सदा शान्त रहती, एक साथ कई कार्य वो करती।। उससे ही समस्त जगत है, सारे संसार की धुरी है वो। रिश्ते नाते लोकाचार उससे, इसीलिए सम्माननीय है वो।। 🙏रचना:- मनोज घिल्डियाल (प्र०अ०)  रा० प्रा० वि० गाडियूंँ  वि० ख०- रिखणीखाल, पौड़ी गढ़वाल 🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

फागुण ब्यो - श्री मनोज घिल्ड़ियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला  "हिम मन मन्थन" में 'होली' पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज  जनपद-पौड़ी, गढ़वाल से शिक्षक साथी श्री मनोज घिल्ड़ियाल जी द्वारा रचित कविता-: 🙏✍️फागुणा ब्यो🌷 एग्ये फागुण ख्यलणा होली, बनि-बन्या रंग धौर्यां वैका थैली। ल्हासण, प्याजै सग्वड़ी हरी बणी, हरिं-भरिं ग्यूं अर जौ सारि फैली।। पिंगली हलदण्य लय्या ल्हेकी, कब्लयिं च पिंगला रंगै की फ्योंली। लाल ललंगा आरू फुलैकी, डाण्ड्यू खितकणू बुरांश डाली।। हिसोलौं नारंगी ट्वपला पैरैकी, सकिन्या फुल्यां भ्यालों गुलाली। मेळू ग्विराल चांदी रंगै की, किनगोड़ै बणी च सतरंगी डाळी।। चखुला उड़ना च्वींचाट कैकी, भौंरो कु गुमणाट अपणि बोळी। गोरू बछलु दोड़ना पुछड़ी उठैकी, चौंखेणा मुण्ड मोल माटु ढोळी। उड़ंदु हूंणू सरैल देख-देखि की, ज्यू ब्वाद मीबि खेलूं आज होली। एग्या फागुण ख्यलणा होली, बनि-बन्या रंग धौर्यां वैका थैली। 🙏रचना:- मनोज घिल्ड़ियाल (प्र०अ०)  रा० प्रा० वि० गाड़ियूंँ वि० ख०- रिखणीखाल  जनपद- पौड़ी 🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

होली - श्रीमती सुशीला थपलियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला  "हिम मन मन्थन" में 'होली' पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज  जनपद-रुद्रप्रयाग, गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-: 🙏✍️‌‌‌ होली  बुराई पर अच्छाई का प्रतीक,  होली रंग लेकर आई है।  आज तन-मन में,  रंगों की बहारें छाई है।।  राग द्वेष मिट गये, रंगों की पावन धार से।  रंग में सारे रंग गये,  पिचकारी की बौछार से।।  दंभ हिरण्यकश्यप का,  क्षणिक पल में मिट गया।  विजय हुई भक्ति की,  प्रहलाद अग्नि से बच गया।।  होलिका वरदान के मद में,  धोका खा गयी।  परिणाम होता गलत कर्मों का,  गलत समझा गयी।।  आओ लगायें रंग ऐसा,  अहसास जिसमें प्यार का।  सम्मान हो अपने बडो़ं का,  ना भाव हो तकरार का।।  रंगों के इस त्योहार के,  रंग से सजाना अपना मन।  ना राग हो, ना द्वेष हो,  सुखमय जियें सब अपना जीवन।।  संस्कृति से जोड़ें इसे,  प्रतिवर्ष प्रतिष्ठा पायें हम।  विलग नहीं हम एक हैं,  सब में भाव, ये...