लालच का जाल-
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद- अल्मोड़ा से शिक्षक साथी श्री ख्याली दत्त जी द्वारा रचित कविता-: 🙏लालच का जाल इतना लालच ठीक नहीं मन, तुझे चाहिए बस रोटी दो। गिने-चुने दिन तुझे मिले हैं, इस धरती पर जीने को।। जिस दिन धरती पर आया तू, कितना भोला भाला था। बिन बाती और तेल बिना, घर में गजब उजाला था।। अवगुण रहित सुन्दर तेरा मन, सबका दुःख हर लेता था। अपनी नटखट लीलाओं से, मन प्रफुल्लित कर देता था।। आज लालच में पड़कर तूने, माया जोड़ना शुरू किया। व्यर्थ की अन्धी दौड़-भाग में, अपनों को खुद से दूर किया।। तेरे दाना-पानी का हिसाब, सभी उसने समेटे रखा है। सारे जग का पालनहार, तुझ पर नजर गड़ाए बैठा है।। अब लालच से बाहर आकर, अपने को निर्मल कर ले। धन-दौलत की चाह त्याग, अपने को शीतल कर ले।। 🙏 रचना:- ख्याली दत्त (स०अ०) रा० प्रा० वि० सकनणा वि० ख०- सल्ट, अल्मोड़ा 🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड