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मई, 2024 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन का दर्शन-श्रीमती सरोज डिमरी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में बुद्ध पूर्णिमा पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- चमोली गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏻🕉️🙏🏻📝मन का दर्शन   तन को यदि कष्ट हो,  तो इंसान झेल लेता है। मन को यदि कष्ट हो,  तो असह्य वेदना होती है।।   ऐसा ही कुछ हुआ होगा,  जो राज-पाठ सुख त्याग किया। पत्नी बच्चे का भी मोह न रहा,  सांसारिक सुख से वैराग्य लिया।।  लेकिन बौद्ध भिक्षुओं से भी,  सदा घिरे वे रहते थे। मन के भाव व्यक्त करते,  अपने प्रवचन करते थे।।  विरक्तता उपेक्षा का भाव लेता,  जो कोई कुछ कहता उत्तर न पाता।  शिष्यों की तब उत्कण्ठा जागी,  जो उत्तर मिलता उपदेश बन जाता।।  ऐसे श्री बुद्ध भगवान को,  बार-बार प्रणाम है। अति व्यग्रता मन की जागे,   तो उसका यह अंजाम है।।  जीवन की सुख सुविधा के लिए,  सदा ही सुरक्षित बने रहना। अपने मन को शान्त रखना,  तन को सदा सक्रिय रखना।।  वक्त की हमेशा कद्र रखना,  भविष्य के लिए भी बचा...

महात्मा बुद्ध - श्रीमती सुशीला थपलियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में गौतम बुद्घ जयन्ती के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती  सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏻🕉️🙏🏻📝महात्मा बुद्ध जन्म लुम्बिनी में मिला, इक्ष्वाकु वंश था पाया। शुद्धोधन पिता थे उनके,  और माता थी देवी माया।। जन्म के सात दिवस ही बीते, माँ दुनिया को छोड़ चली। इस अपार दुखद घड़ी में,  मौसी गोमती आगे बढ़ी।। नाम था सिद्धार्थ गौतम, शाक्य कुल में जो हुए।  राजसी वैभव में पले-बढ़े,  वीतराग से भरे हुए।। सारे सुख थे राजमहल में,  दुनियांँ से थे वे अनजान। पाणिग्रहण यशोधरा से हुआ, राजमहल था गुंजायमान।। एक दिन उत्सुक्ता महल से, बाहर जाने की हुई। नियति के मंसूबे की,  जादुई घड़ी मालूम हुई।। देख एक अर्थी कौतुहल बढ़ा,  क्या! है यह, ये जानने की चाह में। जो गुजर रही थी उनके,  सामने ही राह में।। सारथी से पूछ बैठे  सामने क्या जा रहा। बोल बैठा सारथी  मानव कोई है मरा। सबको जाना है ऐसे ही एक दिन, कोई अमर नहीं है यहाँ। जो आया है वो जाएगा, एक दिन छोड़...

तरु की पीड़ा- श्रीमती सुशीला थपलियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में पर्यावरण संरक्षण व संवर्द्धन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती  सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-: 🙏✍️🌳तरु की पीड़ा जब धरा पर हम नहीं बच पायेंगे, औलाद तेरी मनुज क्या रह पायेगी! तपती धरा का तेज क्या सह पायेंगे? बिन जलस्राव सावन में क्या रह पायेंगे।। बिन तरु धरा वसनहीन हो जायेगी, क्या तुझे ये देख लज्जा ना आयेगी! अपनी महत्वाकांँक्षा के कारण तूने, बेरहमी से मिटा डाले पादप कई।। क्या मनुजता जरा नहीं तुझमें बची! सब जान कर अज्ञान का चोला पहन। क्यों बन रहा तू अनजान ऐसा! क्या! धरा कर पायेगी ये सब सहन।। अब भी संभल जागरूकता का पाठ पढ़, हो सके अधिकाधिक वृक्ष रोपित कर। मत बेरूखी से धरा का अपमान कर, ना कमी हो नीर की तू संचित इसे कर।। पश्चाताप के सिवा न कुछ बच पायेगा, सब कुछ गवांँकर मनुज तू पछतायेगा। बिना तरु के सांँस लेगा क्या यहाँ! या तू कृत्रिम सांँस से चल पायेगा।। प्रकृति ने चेताया तुझे है बार-बार, पर ना समझ पाया तू ये सारा सार। जब तक तेरी समझ में ये आयेगा, तब तक धरा में क्या...

काफल- श्री गोविन्द बल्लभ भट्ट

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में उत्तराखण्ड के राज्य फल के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद- पिथौरागढ़ से शिक्षक साथी श्री गोविन्द बल्लभ भट्ट जी द्वारा रचित कविता-: *🙏🏻📝काफल* देव भूमि का प्यारा फल, कहते जिसको हम काफल, अप्रैल-मई में पकता फल, खट्टा-मीठा, रसीला काफल।। वन्य पशुओं की भूख मिटाता फल, जिसको कहते हम काफल। रोजगार का साधन ये फल, काला-काला मीठा काफल।। पथिकों की प्यास मिटाता फल, देवभूमि का प्यारा काफल। संरक्षण की पुकार करता फल, प्यारा-प्यारा ये काफल।। जल रहे जंगल, मिट रहा फल, जंगल बचाओ कहता काफल। उत्तराखण्ड का प्यारा फल, जिसको कहते हम काफल।। औषधीय गुणों से भरपूर फल, खट्टा-मीठा ये काफल। दीदी-भैजी मिलकर बोलो, हम बचायेंगे अब काफल।। देवभूमि का प्यारा फल, जिसको कहते हम काफल।। 🙏रचना  गोविन्द बल्लभ भट्ट (मुसाफिर) रा० आ० प्रा० वि० -अजेडा  डीडीहाट पिथौरागढ़ 🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

माँ का स्वरूप- श्रीमती सुशीला थपलियाल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में मातृ दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती  सुशीला थपलियाल जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏻📝माँ का स्वरूप  माँ तेरे स्वरूप का क्या वर्णन करुंँ?  तू राग है, तू प्यार है, तू ही मेरा संसार है।  तू हृदय की अन्तस्थली का वो तार है, जिसके निनाद में सांँसों का विस्तार है।।  तू सावन की फुहार है, बसन्त की आहटों का द्वार है।  खिलखिलाते पुष्पों में,  मंडराते भंँवरों सा तेरा प्यार है।। प्रकृति की हर छटा में तेरा रूप है,  सुन्दर सुशोभित अकल्पनीय, तेरा स्वरूप है।  इन चक्षुओं के स्वप्न का तू आधार  है,  बहते दृगों में ओंस की बूंँदों सा तेरा प्यार है।।  ये सच है कि तू अब नहीं मेरे पास है,  पर मेरी हर धड़कन में सदा तेरा वास है।  तू भी हरपल निहारती होगी मुझे,  बस तेरे होने का ही एहसास है।।  इस तसल्ली में सदा जीती हूँ मैं, कि तू यहीं, कहीं मेरे आस-पास है। हर वक्त  राह तकती हूंँ तेरी, माँ मुझे तेरे मिलन की आस है।। ...

हम हैं रक्षक भारत माँ के- श्री ख्याली दत्त

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में मातृ दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- अल्मोड़ा से शिक्षक साथी श्री ख्याली दत्त जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏻🇮🇳📝"हम हैं रक्षक भारत मांँ के" हम तब तक हैं रक्षक तेरे माता, जब तक तन में प्राण रहे। जब तक सूरज चांँद रहेगा, तब तक तू आवाद रहे।। तेरी पावन इस मिट्टी में, पल बढ़ कर हम बड़े हुए। तेरे सहारे, तेरे बलबूते से,  हम पैरों पर खड़े हुए।। तेरी गोद में पल बढ़ करके, आज यहांँ तक आये हैं। आंँच न आये तेरी शान पर,  हम शपथ उठाए  हैं।। यह शीश तेरे चरणों में भारत, जब चाहे चढ़ जायेगा। इस तन के खून का कतरा-कतरा,  एक नया सवेरा लायेगा।।  हम रक्षक बन सीमाओं पर, तेरा परचम लहरायेंगे।  अगर जरुरत पड़ जायेंगी, सीने पर गोली खायेंगे।। सरहद पर तेरे शेर खड़े हों जब, आंँख दिखाने वाला कौन।  तेरे सम्मुख घुटने टेके, सारी दुनिया होंगी मौन।। 🙏रचना-: ख्याली दत्त (स०अ०)  रा० प्रा० वि० सकनणा ब्लाक - सल्ट, जिला अल्मोड़ा 🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

माँ से ही संसार- श्रीमती रेखा पुरोहित

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में मातृ दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती रेखा पुरोहित जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏻📝माँ से ही संसार जननी है वो जन्मदात्री, प्रेम वात्सल्य अपार। त्याग अरु करुणा बसे, हृदय बसे अनुराग।। ममता का भण्डार माँ, करती सबसे प्यार, नव जीवन सृजन करे।  माँ से ही संसार।। उससे ही है चहल-पहल, हर घर अरु हर द्वार। माँ के बिन सूना जगत, माँ अनुपम  उपहार।। माँ होती प्रथम गुरु,  देती सीख हजार।  सच्ची पथ प्रदर्शक वो,  जगत करे आभार।।  माँ की उंँगली थाम कर, चलना सीखे हर बाल। प्रथम सबक सीखे वही,  मिले प्रेम हर हाल।। सौम्य सरल कोमल हृदय, व्यक्तित्व से छलके प्यार। जीवन संचित करती वो, बरसाती प्रेम अपार।। जग समझे दुर्बल उसे, पर माँ बच्चे की ढाल। हित के लिए सन्तान के, माँ बनती महाकाल।।  माँ इक ऐसा शब्द है, जिसमें बसे संसार। अहसास भरा रिश्ता ये, महिमा जिसकी अपरम्पार।। 🙏 रचना रेखा पुरोहित (स०अ०)  रा० प्रा० वि० सौंराखाल  ब्लॉक- जखोली, रुद्रप्रयाग 🙏संकलन- टीम ह...