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श्री गंगा दोहावली - श्रीमती ललिता जोशी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में श्री गंगा दशहरा पावन पर्व पर प्रस्तुत है, आज जनपद- पिथौरागढ़ से शिक्षिका बहिन श्रीमती ललिता जोशी जी द्वारा रचित श्री गंगा दोहावली-: 🙏🕉️✍️श्री गंगा-दोहावली ज्येष्ठ शुक्ल दशमी तिथि, हुआ गंग अवतार। गंगा दशहरा नाम से, पहचाने हर द्वार।। गंगा माँ में स्नान कर, और करे जो दान। पाप सब कट जाते हैं, जीवन हो वरदान। कैवल्य की प्राप्ति हो, कटते हैं दस पाप। भगीरथ का कठोर तप, हरा धरा का ताप।। मोक्षदायी माँ गंगा, करे मनुष्य उद्धार। पूजा के जप दान से, जन हों दुख से पार।। दस की संख्या में करे, जो कोई भी दान। क्षमता के अनुसार हो, माँ गंगा का मान।। फूल-गन्ध अर्पित करे, विधिवत पूजन आज। गंगा के आशीष से, पूरण हों सब काज।। गंगा के संग हरि को, शिव को पूजें साथ। तीनों का आशीष लें, सिर पर सबका हाथ।। दशहरा के अवसर पर, कर दें काया कल्प। गंगा दूषण से बचे, लेते हैं संकल्प।। 🙏रचना:- ललिता जोशी (स०अ०)  रा० उ० प्रा० वि० पुगौर वि० ख०- मूनाकोट, पिथौरागढ़ 🙏संकलन :- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

पर्यावरण धरा की शान-श्रीमती सरोज डिमरी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद- चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-: *पर्यावरण-धरा की शान* पर्यावरण को सजाना है, एक-एक वृक्ष लगाना है। ये संकल्प सब को लेना है, पर्यावरण को बचाना है।। पर्यावरण दिवस मनाया, जल-जंगल का मूल बताया। वृक्षों को आधार बताया, निर्भरता का बोध कराया।। एक उम्मीद-आशा को जगाया, धरती, सूर्य, पहाड़ मन को भाया।  जो याद था उसका चित्र बनाया, कल्पना को रंगों से सजाया।। फूल खिले हों चिड़िया गाती, झर-झर-झर बहता पानी। स्वच्छ हवा हो आती-जाती, भू की सुंदरता को कहती।। आज के दिन संकल्प लेना है, एक पौध भूमि पर लगाना है। उसे खाद पानी देकर के, धरती माँ का रूप सजाना है।। हाँ! मुझे भी वृक्ष लगाना है। स्वच्छ हवा जल-जंगल के लिये। वृक्षारोपण और संरक्षण से, धरती माँ को फिर से सजाना।। 🙏 रचना-: सरोज डिमरी (स०अ०)  रा० आ० उ० प्रा० वि० गौचर चमोली, उत्तराखण्ड 🙏संकलन :- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

पर्यावरण बचाओ - श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती देवेश्वरी सेमवाल जी द्वारा रचित कविता-: 🌍🌳🦜पर्यावरण बचाओ परि और आवरण मिलकर है जो,  वही कहलाता है पर्यावरण।  इसके चहुँ ओर है जो विराजमान,  वही है पर्यावरण की सच्ची शान।।  आओ सब मिल इस धरती को बचायें,  भाँति-भाँति के वृक्ष लगा हम इसे सजायें।  वृक्ष लगाकर चलो मिल पुण्य कमायें,  चहुँ ओर के वातावरण को शुद्ध बनायें।।  चलो वृक्ष लगायें इस माटी को बचायें,  चहुँ ओर के वातावरण को हम सजायें।  हवा, पानी, सब है वृक्षों का वरदान,  हर प्राणी के जीवन में भरते हैं प्राण।।  सम्पूर्ण जीव-जगत के हैं ये आसरा,  परोपकारी होता है इनका जीवन सारा।  सम्पूर्ण जगत को देते हैं ये घर, हवा, पानी,  हर एक प्राणी के जीवन की करते निगरानी।।  सब मिल अभियान चलायेंगे, वृक्ष लगायेंगे,  अपने गाँवों को हम मिल स्वर्ग बनायेंगे।  हर कार्य सब मिलकर साथ निभायेंगे,  और अपने जीवन को आनन्दमय बन...

वृक्षारोपण एक उपाय-श्रीमती सन्नू नेगी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद- चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी द्वारा रचित कविता-: 🌎🦚🌲🌧️🦌🌍 *वृक्षारोपण एक उपाय* सुन्दर वन सघन देत छाया, प्रकृति की ये सच्ची माया। तरु, पुष्प, लता और शाखा, ये सब धरती की हैं काया।। अन्न-धन, हवा और पानी, धरती से मानव ने पाया। धरती माता है अति प्यारी, रूप धरा का सबको भाया।। पेड़-पौधे धरती की जान, मनुज इसको तू पहचान। तेरा भी कल्याण तभी, वृक्ष-लता तेरी भी जान।।  अविष्कारों के दौर तुम्हारे, होते  नित आयाम तुम्हारे। पर्यावरण से अति छेड़छाड़, निशदिन हैं ये काम तुम्हारे।। अगर न होगें पेड़-पौधे, बोलो, क्या जी पायेंगे? हवा-पानी कुछ न रहेगा, अविष्कार यूँ ही रह जायेंगे।।  धरती का अस्तित्व रहा तो, मानव भी बच पायेगा। हरियाली का रोपण करेंगे, तो सकल जग बच पायेगा।। प्रकृति के क्यों बैरी बनते, ये तो जीवनदायिनी है। नदी-नाले, पोखर, झरनों की, यही तो सुन्दर कहानी है।। छोड़ो लड़ाई वर्चस्व  की, जुल्म न करो इस उर्वी पर। मानव का संहार है होता, पर्यावरण जाता हासिये पर।।...

पर्यावरण बचाना होगा - श्रीमती गंगा आर्या जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद- पिथौरागढ़ से शिक्षिका बहिन श्रीमती गंगा आर्या जी द्वारा रचित कविता-: *पर्यावरण बचाना होगा* 🌎🦚🌲🌧️🦌🌍 आओ पर्यावरण दिवस मनायें, हम सब मिलकर वृक्ष लगायें। धरती को हरा-भरा बनायें,  प्रदूषण रोक धरती को बचायें।। धरा पर अधिक वृक्ष लगाकर, धरती माँ का आँचल भर दो। दागदार चुनरी धानी कर दो, वृक्षों से धरा को हरा-भरा कर दो।। आज प्रण यह लेना होगा, पर्यावरण को न पहुँचायेंगे नुकसान। ग्लोबल वार्मिंग से खतरे में है जान, पर्यावरण संरक्षण में ही हमारी शान। वृक्ष धरा के हैं आभूषण, करें सदा इनका संरक्षण। नहीं करेंगे हम यदि इसका मान, तो, यह होगा जीवन का अपमान।। इन्हीं से धरा सजती-संँवरती, मुस्काती और खुश होती है। बदले में शुद्ध प्राणवायु ये, मुफ्त में हमको देती है।। समय आ गया संकल्प करें हम, धरती को स्वर्ग बनायें हम। आओ! पर्यावरण दिवस मनायें,  हम सब मिलकर वृक्ष लगायें।। 🙏 रचना -: गंगा आर्या (प्र०अ०) रा० प्रा० वि० भट्टीगांव वि० ख० बेरीनाग जनपद -पिथौरागढ़ 🙏संकलन :- टीम हिम मन मन्थन, उत...

धरती माँ को दूषित न करें - श्रीमती भागीरथी पाण्डे जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद- नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती भागीरथी पाण्डे जी द्वारा रचित कविता-: धरती मांँ को दूषित न करें  🌎🌲🦜🌹🌧️🌍  ================= धरती मांँ की गोद में खेले, पले, बढ़े तुम हुए जवान। खाकर अन्न जिस धरा माँ का, पाकर पोषण बने बलवान।। बदले में तुमने सोचो हे मानव! उस माँ को क्या उपहार दिया। कूड़ा-कचरा, गन्दगी, प्लास्टिक, और जहर से आँचल पाट दिया।। पेड़ों से पायी प्राणवायु तुमने, फल, फूल, ईंधन और छाया, अनुपम सौंदर्य और हरियाली, सब सुख जीवन का तुमने पाया।। उन्हीं जीवनदाता पेड़ों को, विकास का नाम दे काट डाला। धन के लालच में पड़कर तुमने, पालनहार को ही बेच डाला।। जिन स्रोतों का शीतल मधुर जल, अमृत बन रगों में दौड़ रहा। जिन पावन नदियों के तटों पर, प्रभु ने भक्तों हित अवतार लिया।। उन्हीं जलस्रोतों और नदियों को, तुमने प्रतिपल प्रदूषित किया। कुओं, तालाबों को सुखा दिया, नदियों में रसायन घोल दिया।। नदी, जंगल, जमीन पर ही, थमा नहीं तुम्हारा कहर। रत्नाकर के भण्डार को भी, रुके नहीं तुम प्र...

पर्यावरण संरक्षण-श्रीमती रेखा पुरोहित जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पर्यावरण दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती रेखा पुरोहित जी द्वारा रचित कविता-: 🌳🦜🌻🌧️पर्यावरण संरक्षण नग्न होती ये माँ धरती,  कैसे सजेगी बिन तरूवर? एक-एक पौधा रोपें हम सब, गांँव-गली या कोई डगर।।  कंक्रीट के जंगल बस गये, चारों ओर जहाँ देखो। कमी हवा पानी की हो गयी, अब चाहे तुम जहाँ भी देखो।। जो अब भी हम ना संभले,  तो फँसेंगे विकट समस्या में। बंजर धरती और सूखे नल, बस देंगे यही विरासत में।। नष्ट किया सौन्दर्य धरा का, अब बारी संरक्षण की। वृहद वृक्षारोपण करके, वसुधा फिर से सजाने की।।   वृक्षारोपण करके हम सब, आओ! अब धरती को सजायें। साँसों पर जो संकट आया, उसको भी हम दूर भगायें।। आओ! सब मिल पेड़ लगायें, सपने सुन्दर कल के सजायें। मिलकर अब हम कसम ये लें,  वृक्षों से अलंकृत भू को करें।। 🙏 रचना:-  रेखा पुरोहित  (स०अ०) रा० प्रा० वि० सौंराखाल  वि० ख० जखोली, रुद्रप्रयाग 🙏संकलन :- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड 📝 नष्ट किया सौन्दर्य धरा का, अब बारी संरक्षण ...

धूम्रपान-श्रीमती सन्नू नेगी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में नशा उन्मूलन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद- चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी द्वारा रचित कविता-: 🚭✍️धूम्रपान        सब व्यसनों से दूर रहेंगे, धूम्रपान से सदा बचेंगे। जीवन यह अनमोल है, इसका नहीं कोई मोल है।। देह ये देवालय बने, ध्यान योग में मन लगे। सदैव प्रसन्नचित रहेंगे, धूम्रपान से सदा बचेंगे।।  अच्छा घर परिवार बने, व्यसन रहित समाज बने। सब प्रतिज्ञा लेकर रहेंगे, धूम्रपान से सदा बचेंगे।।  बीड़ी सिगरेट जब न बिकेगा, कोई नहीं फिर इसे पियेगा। सभी धूम्रपान से दूर रहेंगे, धूम्रपान से सदा बचेंगे।।  जन-जन को जगाना है, धूम्रपान, शराब से बचना है। स्वस्थ समाज का विकास करेंगे, धूम्रपान से सदा बचेंगे।।   स्वस्थ और मस्त रहेंगे,  धूम्रपान जब हम न करेंगे।  जन जन से अब ये कहेंगे,  धूम्रपान से सदा बचेंगे।।  तम्बाकू, गुटका या हो बीड़ी, व्याधियों की ये सब सीढ़ी। चलो सब यत्न करेंगे, धूम्रपान से सदा बचेंगे।। जहर से यह जहरीला, खत्म कर इसकी लीला। फेफड़े नहीं खराब कर...

नशा मुक्त - श्रीमती सरोज डिमरी जी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में नशा उन्मूलन परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद- चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-: नशा मुक्त ना कर तू इसका यह फैशन,  होत बुरी लत ये, जग माही।  देखत तू इसका यह मंजर, होत बुरी गत देखत जायी।।   नाश करें धन देहन का यह,   होत बुरा इससे कुल का ही। आदि बने, जब हो मन दुर्बल, त्याग करो इसका तुम ताही।।  जो कर दो तुम दूर इसे तब,  मौलिकता तुम में छप जाती। दूर करो इन बातन को तुम,  जो सब में मय यूँ छलकाती।।  दौलत मान सभी उड़ जावत,   होत नशा जग में भय भारी।  दूर नशा कर दो तुम तो यह,   मानव जीवन हो उपकारी।।   सेवन सोमरसी बनते जब,   शौक सदा लगता नित का ही।  जीवन का मत नाश करो तुम,  सोच, भला मिलता फिर नाही।।  रचना-: सरोज डिमरी (स०अ०) रा०आ० उ० प्रा० वि० गौचर ब्लॉक- कर्णप्रयाग, चमोली 🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड