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महालया- श्रीमती सरोज डिमरी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पितृपक्ष के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सरोज डिमरी जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏾🕉️🙏🏾महालया  सोलह दिनों की महालया में, बच्चों ने सब कुछ सीखा। माता-पिता, दादा-दादी को, श्रद्धा से नमन करते देखा।। पूछा दादी यह क्या होता,  क्यों निराहार दिन भर हम रहते। दोपहर में जाकर के, तर्पण पूजन हैं करते।। दादी-बोली सुन मेरे मुन्ने,  यह है पूर्वजों का पूजन।। इसमें हम अपने पितरों को  देते हैं तिल जल तर्पण।। दान श्राद्ध से उन्हें मनाते,  जो थे हमसे पहले।  उनकी ही मेहनत के बल,  हम सब हैं चरित्र रूपहले।। याद करते सभी जन,  मिलजुल कर करते यजन। परस्पर सम्मान सब में,  सर्वत्र जगह में श्रद्धा तर्पण।। दीन-दुःखी असहायों को, अन्न-वस्त्र-जल देते। बच्चों ने कुछ नया सीखा, मर्यादा की शिक्षा लेते।। हम सबने इसे अपनाया, अनुशासित जीवन समझ में आया। एक स्वर से पर्व मनाकर, एकता का पाठ पढ़ाया।। जो कल थे वह आज नहीं,  संसार की है रीत यही। जो आया वह जाएगा,  धरती माता यही की ...

हिन्दी की व्यथा-श्रीमती विनीता खाती

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📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में हिन्दी दिवस के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद अल्मोड़ा से शिक्षिका बहिन श्रीमती विनीता खाती जी द्वारा रचित कविता-: ✍️हिन्दी की व्यथा मैं राजभाषा हिन्दी हूँ, सुनाती अपनी कहानी। आपसे हूँ मैं परिचित, और जानी पहचानी।। मैं ही थी जो लोगों के,  हृदय में उमंग भरती थी।  मैं ही थी जो सबके, दिलों में राज करती थी।। मैं ही थी वह भाषा जो,  सबकी हमजोली थी। घर-घर में सबसे प्यारी,  सबकी मैं सहेली थी।। क्या हुआ न जाने? अब मैं सबसे दूर हो गई। अपने ही घर में अपनों से, अब मैं पराई सी हो गई।। अब कहाँ मिलता है मुझे,  वह पहले सा सम्मान। अब तो घटता जा रहा, प्रतिदिन ही मेरा मान।। मुझे जानने वाले लोग,  कम पढ़े-लिखे हो गए। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोल, वो बुद्धिमान हो गए।। जब मुझे बोलने पर, विद्यालय में दण्ड है मिलता। तब महसूस करती हूँ मैं,  स्वयं का पतन होता।। मातृभाषा बनकर मुझे,  होती है बड़ी निराशा। अपने ही घर हो रही, देखो!  मेरी दुर्दशा।। विचार-विमर्श संचार का,  माध्यम बनूंँ, थी अभिलाषा। पर अब तो चर्चा मे...

हिन्दी से रोशन हिन्दुस्तान-श्रीमती अमिता कालरा

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में हिन्दी दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती अमिता कालरा जी द्वारा रचित कविता-: ✍️🇮🇳हिन्दी से रोशन हिन्दुस्तान हिन्दी है आत्मा हमारी,  हिन्दी है पहचान। इसके बिना अधूरा है,  भारत का सम्मान।। मिट्टी की खुशबू है इसमें,  माँ की मधुर पुकार। मन के सारे भाव समेटे,  हर दिल का श्रृंगार।। यही वो भाषा है जिसमें, माँ ने गीत सुनाए। लोरी बनकर अँखियों को, सपनों की सैर कराए।। पहली बूँद सी मधुर लगती, भीनी-भीनी आवाज। फिर क्यों अपने ही आंँगन में! घटता इसका अंदाज।। फिर भी कैसी विडम्बना है! कैसी ये पहचान! अंग्रेजी बोल इतराएँगे,  हिन्दी में अपमान।। अपनी भाषा बोलने में, संकोच क्यों है आता। माँ की बोली भूल के मानव,  और कहाँ सुख पाता।। हिन्दी में अन्तर्निहित किस्से,  पुरखों की ये बात। संघर्षों की गाथाएँ,  साहस की सौगात।। जन-जन की संवेदना,  कण-कण में विश्वास। हिन्दी ही तो जोड़ती है,  दिल से दिल की आस।। यह भाषा केवल शब्द नहीं,  जीवन का है गीत। धरती की लय, ऋत...

हिन्दी पहचान हमारी- श्रीमती मंजुलता

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में हिन्दी दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती मंजुलता जी द्वारा रचित कविता-: ✍️🇮🇳हिन्दी पहचान हमारी  हिन्दी भाषा गर्व हमारी, हमें इस पर नाज है। हिन्दी भाषा पहचान हमारी, यह हमारी शान है।। हिन्दी हमारी आन है, हिन्दोस्ता की जान है। मातृ भाषा ये है हमारी, भारत की पहचान है।। उठो धरा के नौ जवानों, मातृ भूमि पुकारती है। मातृ भाषा को मान्यता दो, इसको अपनी पहचान बना दो।। ये भाषा पहचान हमारी, प्यार है, स्नेह इसमें। महसूस इसको कर सको तो, दिल को इससे जोड़ दो।। है हमारी शक्ति हिन्दी, एक सहज अभिव्यक्ति हिन्दी। अनेकता को एकता में, बांँधने का सूत्र है हिंदी।। हिन्दी दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभ कामनाएँ  📝 रचना- मंजुलता (स० अ०) रा० क० उ० प्रा० वि० बौंला  वि० ख०- कर्णप्रयाग, चमोली। 🙏संकलन-  टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

हिन्दी की वैज्ञानिकता- श्रीमती सन्नू नेगी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में हिन्दी दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी का आलेख-: ✍️🇮🇳हिन्दी की वैज्ञानिकता भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह चिन्तन का दर्पण भी होती है। हिन्दी इसी दृष्टि से विशिष्ट और वैज्ञानिक है। इसकी वैज्ञानिकता का मूल आधार ध्वनि, व्याकरण और लिपि की सहजता में निहित है। जब हम हिन्दी के स्वरूप को गहराई से देखते हैं तो पाते हैं कि यह केवल भावनाओं की भाषा नहीं, बल्कि विचारों के अनुशासन की भाषा भी है। हिन्दी की लिपि देवनागरी पूर्णतः ध्वन्यात्मक है। जिस प्रकार एक गणितीय सूत्र हर बार समान परिणाम देता है, उसी प्रकार हिन्दी का हर अक्षर अपनी स्थिर ध्वनि के साथ उच्चारित होता है। यहाँ वर्णमाला का क्रम स्वर से व्यंजन की ओर किसी भी वैज्ञानिक अनुक्रम से कम नहीं। यह क्रम ध्वनियों के उच्चारण स्थलों के आधार पर बना है; अर्थात् जो ध्वनि गले से निकलती है, वह पहले, और जो होंठों पर जाकर पूर्ण होती है, वह बाद में। यह शास्त्रीयता विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरती है। व्याकरण की दृष्टि से भी हिन्दी...

मैं एक छोटा बच्चा हूँ-श्रीमती भावना पाण्डेय

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है, आज जनपद नैनीताल से शिक्षिक बहिन श्रीमती भावना पाण्डेय जी द्वारा रचित  कविता-: ✍️मैं एक छोटा बच्चा हूंँ मैं जब छोटा बच्चा था, बड़ी शरारत करता था। लगता मुझको अच्छा था, पर सबको गुस्सा आता था।। फिर मैं गया स्कूल, शरारत करना गया भूल। मेरी टीचर अच्छी थी, बहुत प्यार से पढ़ाती थी।। जाना मैंने अक्षर को जब, पढ़ने लगा धड़ल्ले से तब। जाना मैंने ए, बी, सी, पढ़ने लगा अंग्रेजी भी।। खेल-खेल में बड़े मजे से, सीखी मैंने गिनती भी। पहाड़े, जोड़, घटाने संग, सीखा मैंने भाग भी।। करता हूँ खेल-खेल में, अब तो प्रश्न इबारती भी। जाना मैंने पेड़-पौधों को यातायात के साधन भी।। रिमझिम हो या हो मैरीगोल्ड, गणित वाटिका या पर्यावरण। सब का करने लगा हूँ मन्थन, करता मैं अब इन्हें स्मरण।। खेलकूद, इंग्लिश स्पेलिंग, मैथ्स विजार्ड या ड्राइंग। सब में प्रतिभाग लेता हूँ, सदा आगे मैं रहता हूँ।। कुछ शरारत अभी भी जारी, क्योंकि मैं अभी छोटा बच्चा हूँ। मेरे भी कुछ अपने सपने हैं, मैं मन से बिल्कुल सच्चा हूँ।। बनूंँ मैं भी बड़ा महान, करूँ जग में अपना ना...

गुरुवर-श्री गोविन्द बल्लभ भट्ट

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन" में  प्रस्तुत है, आज जनपद पिथौरागढ़ से शिक्षक साथी श्री गोविन्द बल्लभ भट्ट जी द्वारा रचित  कविता-: ✍️🙏🏾🕉️🙏गुरुवर ज्ञान के सागर, मति के भास्कर, शिक्षा में है जिनकी झलक। दया, धर्म का मार्ग दिखाते, मानवता का पाठ पढ़ाते हैं।। अज्ञान तम का हर करके, ज्ञान की जोत जलाते हैं।। वो गुरुवर कहलाते हैं, वो गुरुवर कहलाते हैं।। सपनों को जो पंख लगाते, जीवन पथ पर चलना सिखाते। संस्कारों का पाठ पढ़ाते, सम्मान व स्नेह दिखलाते हैं।। आदर्शों की बनकर मिसाल, जो पथ प्रदर्शक बन जाते हैं। वो गुरुवर कहलाते हैं, वो गुरुवर कहलाते हैं।। मन बच्चे का कोरा कागज़, अमिट ज्ञान उसमें भरते हैं। जाति-धर्म पर लड़े न कोई, ऐसा पाठ पढ़ाते हैं।। बन छात्रों का जीवन आधार, सही-गलत का भेद बताते हैं। वो गुरुवर कहलाते हैं, वो गुरुवर कहलाते हैं।। कभी प्यार तो कभी डांँट दिखाते, हार कर भी जो, जीत सिखाते। नेकी की वो राह दिखाते, सतकर्मों का पाठ पढ़ाते।। ठोकर खा कर भी जो,  शिष्य को चलना सिखाते। वो गुरुवर कहलाते हैं, वो गुरुवर कहलाते हैं।। ✍️रचना- गोविन्द बल्लभ भट्ट (मुसाफ...

गुरु महिमा- श्री मनोज घिल्डि़याल

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन"  में शिक्षक दिवस पावन पर्व पर  प्रस्तुत है, आज  जनपद पौड़ी गढ़वाल से शिक्षक साथी श्री मनोज घिल्डि़याल जी द्वारा रचित  कविता-: 🙏🏾🕉️🙏🏾✍️गुरु महिमा  गुरु वशिष्ठ की तपस्थली पहुंँचकर, विद्यार्जन किया पद शीश रखकर। जीव जगत के क्लेश मिटाकर, मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाए।। गुरु सांदीपन के आश्रम रहकर, ज्ञानार्जन किया श्रम से तपकर। लोक कष्ट हरे पापियों का नाशकर, श्रीकृष्ण भगवान कहलाए।। गुरु द्रोणाचार्य की छत्र छाया धरकर, धनुर्विद्या में पारंगत बनकर।  विपक्षियों को धूल चटाकर, अर्जुन महान धनुर्धर कहलाए।। गुरु रामकृष्ण की कृपा माथ धर, धर्म आध्यात्म की दीक्षा धारणकर। हिन्दू धर्म का परचम फहराकर,  स्वामी विवेकानन्द कहलाए।। गुरु आचरेकर की दीक्षा से मथकर, सचिन ने कठोर श्रम तपकर, विपक्षियों के छक्के छुड़ाकर, क्रिकेट देवता तेंदुलकर कहलाए।। गुरु महिमा को जान ले यदि नर, सरल हो जाय लक्ष्य प्राप्ति डगर। इसीलिए ज्ञानीजन कहें ध्यान धरकर, कुछ भी नहीं है गुरुकृपा से बढ़कर।। ✍️रचना-:   मनोज घिल्डियाल  (सहा...