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हेमवती नन्दन बहुगुणा जी- श्रीमती माधुरी नैथानी

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में हिमालयपुत्र- हेमवती नन्दन बहुगुणा जी की जयन्ती के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती माधुरी नैथानी जी का आलेख-: 🙏✍️हिमालय पुत्र- हेमवती नन्दन बहुगुणा   हिमालय जैसा दृढ़ सकंल्प एवं विराट व्यक्तित्व के धनी हेमवती नन्दन बहुगुणा जी का जन्म पौड़ी गढ़वाल के बुघाणी गांँव में 25 अप्रैल 1919 को रेवती नन्दन बहुगुणा जी के घर में हुआ था। मध्य हिमालय की तलहटी में जन्मे इस महानुभाव के अन्दर राजनैतिक विलक्षणता, संघर्ष शीलता, समाज-उत्थान की परिकल्पना व गजब का आत्मबल था। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय देवलगढ़ तथा मिडिल क्लास शिक्षा खिर्सू से पूरी करने के बाद बहुगुणा जी ने आगे की शिक्षा डी०ए०वी०कालेज देहरादून से पूरी कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की परीक्षा पास की तथा यहीं से उनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत हुई। आन्दोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने वाले बहुगुणा जी को पकड़ने के लिए अंग्रेज सरकार ने 5000.00रुपये तक का नगद इनाम रखा। राजनीति में माहिर होने पर सभी दिग्गज इनसे भयभीत रहते थे। जवा...

माँ का आगमन- श्रीमती रेखा पुरोहित

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में नवरात्रि पावन पर्व के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद- रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती रेखा पुरोहित जी द्वारा रचित कविता-: 🙏🏻🕉️🙏🏻📝माँ का आगमन  आ गई नवरात्रि है, सज गया दरबार माँ। दुर्गा-दुर्गति-नाशिनी तू, करती भव से पार माँ। भक्ति भाव मन में लिए, राह तेरी तकते हैं माँ।  चरण कमल से शोभा अब,   मेरे घर की बढ़ाओ माँ।। चुनकर सुन्दर सुन्दर फूल, घर को हमने सजाया माँ। आ जाओ अब द्वार मेरे,  लगा तेरा दरबार माँ।। धूप दीप नैवेद्य से,  तेरा स्वागत करेंगे माँ। पूजन वन्दन आराधन,  मधुर भजन से करेंगे माँ।। विधि पूजन की नहीं जानते, हम सब हैं अज्ञानी माँ। तू ही जननी है हमारी, शरण पड़े हैं तेरी माँ।।   नव दिवस नवरात्रि के, तेरा ही गुणगान माँ। दुख विनाशनी हो तुम ही, नैय्या पार लगाओ माँ।। 🙏🏻रचना - : रेखा पुरोहित (स०अ०)  रा० प्रा० वि० सौंराखाल वि ०ख०- जखोली, रुद्रप्रयाग 🙏संकलन- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

अन्नदाता- श्रीमती उषा सागर

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 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला, हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है आज जनपद- पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहन श्रीमती उषा सागर जी द्वारा रचित कविता-: *अन्नदाता* शीत, मेह, धूप में तपता है जो, मेहनत नित-नित करता रहता। माटी में सोना उगलाने, जुट जाता है कर्मठ किसान।। चीर धरा का सीना वो, पसीना खूब बहाता रहता। हरे लहलहाते खेतों की हसरत में, कठिन परिश्रम करता किसान।। अन्न का एक-एक दाना उपजाने, हर जन तक भोजन पहुंँचाने। रात दिन व तपती धूप में मेहनत करके, पसीना अपना बहाता किसान।। जग की भूख मिटाने की खातिर, अपनी भूख की न चिन्ता उसको। एक-एक दाना सोने जैसा, मेहनत से जुटाता किसान।। रात्रि के अन्धकार में भी फसलों को, अभिषिक्त, सिंचित करते जाना। विषधर, व्याघ्र से निर्भय होकर, कर्तव्य निर्वहन करता किसान।। जब धरती उगलने लगती सोना, नहीं चाहता किंचित भी खोना। जंगली जानवरों से रखवाली कर, घर-घर अन्न पहुंँचाता किसान।। भूखा रहे न देश का बच्चा, है उसकी उन्नत सोच महान। अपने जीवन की परवाह न करता, तेरा जीवन बचाने किसान।। उसके मलिन वस्त्रों को देख, न करना कभी उसका अपमान। है वह अन्नदाता हमारा, अपने देश की ...