है रंगीली आज धरती - श्री विजय प्रकाश रतूड़ी

 प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में होली के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद टिहरी-गढ़वाल से शिक्षक श्री विजय प्रकाश रतूड़ी जी की रचना



है रंगीली आज धरती।


है रंगीली आज धरती,

पेड़ पत्ते सब रंगे हैं।

गाल देखो बाल देखो,

सब रंगीले हो गये हैं।। 


चल रही है महक मोहक,

विविध पकवान बन रहे हैं।

स्नेह झरने बह रहे हैं,

प्रेम की पिचकारियों से।। 


हैं कहीं भी भाव रूखे!

आज सिंचित हो रहे हैं।


गहन विस्मय में है तितली!

आज तितलियों को निहारे।

ये तितलियाँ कौन हैं!

जो उमंग के पंख पाकर।। 


बिना 'पर' ही भाव नभ में, 

राग की भरती उड़ाने।


नाच पड़ती मन हो जब भी,

गीत गाती भाव भरके।

और ढोलक की तनाधिन,

हर गली में आज बजती।। 


कुछ रंगीले लोग देखो!

भाव भरके नृत्य करते।

और होली की बधाई,

होली है वे कह रहे हैं।। 


है लवालव भाव सरिता, 

भाव में भर बह रही है।। 


🙏रचना:-विजय प्रकाश रतूड़ी (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि० ओडाधार,

ब्लॉक-भिलंगना, जनपद टिहरी गढ़वाल



🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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