होलिका दहन - श्रीमती हेमलता बहुगुणा
प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में होली के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है आज जनपद टिहरी-गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती हेमलता बहुगुणा जी की रचना
होलिका दहन
हिरण्यकशिपु की बहन होलिका,
थी प्रवृत्ति दुष्ट उसकी।
वरदान प्रभु से माँगा उसने,
मिल चादर पावन अग्नि की।।
भक्त प्रह्लाद बेटा हिरण्यकशिपु का,
हरि विष्णु की भक्ति करता था।
हिरण्यकशिपु भी प्रह्लाद की भक्ति,
बिल्कुल पसन्द नहीं करता था।।
बहुत समझाया प्रह्लाद को उसने,
विष्णु नाम नहीं मेरा नाम भजो।
पर प्रह्लाद विष्णु की भक्ति में,
विष्णु नाम विष्णु नाम भजो।
गुस्सा आया उसको इतना,
बहन होलिका को बुला लिया।
मार डाल प्रह्लाद को तू,
हुक्म बड़ा उसे दे डाला।।
बैठी होलिका चादर ओढ़े,
प्रहलाद को गोद में उठा लिया।
पर चादर ने छोड़ प्रह्लाद को,
होलिका को ही जला दिया।।
फिर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को,
अग्नि खम्भ में बाँध दिया।
लीन रहा प्रभु की भक्ति में
दण्ड मिला कुछ पता न चला।।
इसी खुशी में भक्त सभी,
होली को मनाते हैं।
करते हैं होलिका दहन,
भक्त की जीत बताते हैं।।
रचना-
हेमलता बहुगुणा (प्र०अ०)
रा०उ०प्रा०वि० सुरसिंहधार
चम्बा, टिहरी गढ़वाल
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें