होली का ऐतिहासिक व सामाजिक महत्व
प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में होली पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षक श्री हेमन्त चौकियाल जी का होली से सन्दर्भित सारगर्भित लेख:-
*होली - होल्यार और हुड़दंग के बीच होली का ऐतिहासिक और समाजिक महत्व*
जहाँ दशहरा शत्रु पर विजय का प्रतीक है, वहीं होली स्वयं पर विजय का प्रतीक है। अपने राग-रंग, ईर्ष्या, विद्वेष, अहम् जैसे अवगुणों (बुराइयों) को फाल्गुन की पूर्णिमा (रात्रि में ज्ञान का प्रतीक) में जलाकर, सुबह (उजाले में अपने अज्ञान का बोध) होने पर वैमनस्य को भूलकर, अपने मन से इन बुराइयों को समाप्त कर, रंगों में (प्रेम व खुशी का प्रतीक) में भीगना ही होली है।
*इतिहास के आइने में होली*
ऋग्वेद (5/44/15)के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति अग्नि से हुई है।यदि हम पृथ्वी की उत्पत्ति के (Big Bang Theory) महाविस्फोट सिद्धांत को, ऋग्वेद की इस रिचा के अनुसार व्याख्या करते हुए, वैज्ञानिक विश्लेषण व तथ्यों को जोड़ते हुए देखें तो, यह बात पूर्ण सत्य ही साबित होती है कि पृथ्वी सहित सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति अग्नि से ही हुई है। सनातन धर्म में इस घटना का दिन चैत्र प्रतिपदा माना जाता है। चैत्र प्रतिपदा से ही नव संवत्सर (नया साल) शुरू होता है।
सनातन धर्म की एक बड़ी विशेषता यह है कि-यहाँ हर नई चीज को शुरू करने या उसके आगमन से पहले *कुछ विशेष* किया जाता है। यह विशेष कार्य पवित्रता (रोगाणु मुक्त), शुद्धता के निमित्त किया जाता है। इस कड़ी में, सनातन धर्म में यज्ञ को बहुत महत्व दिया जाता है। वैज्ञानिकों अनुसंधानों ने साबित किया है कि यज्ञ में आहुति दिए जाने वाले विशेष पदार्थों से रोगाणु-विषाणु नष्ट होते हैं।नये संवत्सर के आगमन से पूर्व बाहर के रोगाणु (पर्यावरण) और मानव के भीतर (मन मस्तिष्क) के अवगुण रूपी रोगाणुओं (राग, द्वेष, ईर्ष्या, अहम्) को होली में जलाकर, शुद्ध होकर नये साल का स्वागत करने की तैयारी है।
*केवल भारत ही में नहीं मनाई जाती-लगभग पूरे विश्व में है अलग अलग नामों और रूपों में प्रचलित*
अगर आप विश्व भर का अवलोकन करें तो पायेंगे हर महाद्वीप के हर देश में होली का त्योहार किसी न किसी रूप में प्रचलित और मौजूद है, भले ही अपभ्रंश के चलते (या आधुनिक बनने की भेड़-चाल में) वह आज वर्तमान समय में किसी अन्य नाम व रूप में प्रचलित हो गया हो। कुछेक उदाहरणों से आप बात का मर्म समझ जायेंगे।
आपने योरोप (स्पेन) के टमाटर उत्सव (जिसमें एक स्थान पर एकत्र होकर एक - दूसरे को टमाटर फेंक कर मारे जाते हैं) जिसे La Tomatina कहते हैं, इसी प्रकार विश्व के अन्य देशों - सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद, तोबागो, दक्षिण अफ्रीका, सिंगापुर, मलेशिया, कैनेडा, आस्ट्रेलिया, फीजी में भी होली के ही आसपास होली से मिलते जुलते त्योहारों का आयोजन होता है।हमारे पड़ोसी देशों - नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश आदि में तो होली लगभग इसी रूप में मनाई जाती है।
*भारतीय उपमहाद्वीप में होली*
भारतीय राज्यों की बात करें तो लगभग सम्पूर्ण भारत में थोड़ी-बहुत भिन्नता के साथ होली का त्योहार मनाया जाता है। मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाकों में इसे भगोरिया होली तो, बिहार में फगुआ, तमिलनाडु में वसन्तोत्सव व यौवन का त्योहार कमनपोडिगई के रूप में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में होली की ही तरह-तरह रंगों (सूखा गुलाल-जो पेड़-पौधों से बनाया जाता है) का त्योहार रंग पंचमी के नाम से जाना जाता है। हरियाणा में यही त्योहार देवर-भाभी के त्योहार धुलंडी के रूप में प्रसिद्ध है। ब्रज में यही त्योहार लठमार होली के नाम से विश्वविख्यात है। पंजाब में तो इस त्योहार की मस्ती देखते ही बनती है, यहाँ इस अवसर पर शक्ति प्रदर्शन की भी परम्परा है।
*उत्तराखंड में होली* -
उत्तराखंड की बात करें तो कुमाऊँ की बैठकी होली, जो होली से लगभग एक माह पूर्व से शुरू हो जाती है। इसमें स्त्री-पुरुष मिलकर शास्त्रीय संगीत की धुनों-विहाग, जैजैवन्ती, बागेश्वरी, श्याम कल्याण, भैरवी, खम्माज पर झूमते हैं। विशेषता की बात यह है धीमे संगीत और स्थाई भाव के गीतों के साथ जब होली से एक सप्ताह पूर्व यही संगीत तेज धुन (चलती) में बदलकर माहौल में तेजी ले आता है तो इसे खड़ी होली कहा जाता है। खड़ी होली में स्त्री पुरूष एक मुख्य वक्ता के गीतों को दोहराते हुए खड़े होकर नाचने लगते हैं। यह नाच एक लयबद्ध कदमताल की तरह होता है।
इस माह पूर्णिमा से पहले की एकादशी को रंगभरनी एकादशी कहा जाता है। इसी दिन किसी विशेष लेकिन पूर्व निश्चित स्थान के आँगन में चीर और होली की ध्वजा को स्थापित करके होली गायन प्रारम्भ किया जाता है, भले ही कुछ नव युवा वर्ग अब अपनी सुविधानुसार स्थान का चयन कर रहे हैं, लेकिन पुराने हुनर बाज आज भी परम्परागत रूप से अपनी परम्पराओं का ही अनुसरण करते हैं।
पूर्णिमा से पहले अष्टमी तिथि को देव मन्दिरों में चीर वंदन किया जाता है।इस दिन देवालयों में चीरबंधन के गीत गाये जाते हैं। होलिका दहन के दिन (चतुर्दशी तिथि) को कोरी होली तो (पूर्णिमासी की रात बीतने के बाद)दूसरी दिन की होली को गीली होली कहते हैं।
*गढ़वाल की होली-*
गढ़वाल में बैठकी होली लगभग एक पक्ष पहले ( प्रतिपदा तिथि से ) शुरू होती है। इसमें बड़े-बुजुर्ग एक स्थान पर बैठकर दादरा, ठुमरी, जैजैवन्ती, राग मल्हार जैसे गीतों का गायन करते हैं। यह कार्य प्रारम्भ किसी पंचायती स्थान से होता है, परन्तु गायकों की सुविधानुसार इस स्थान में बदलाव किया जा सकता है। वहीं अवयस्क (विशेषकर शैशवावस्था वाले बच्चे) जिन्हें होल्यार कहा जाता है, एक तिकोने झण्डे के साथ टोली बनाकर, ऐसे स्थानों पर जाते हैं, जहाँ वे राहगीरों को टीका लगाकर, भेंट में कुछ धन (सिक्के या नोट) प्राप्त कर सकें।यह क्रम होली के नजदीक आते, नजदीकी गाँवों में फेरी लगाने में बदल जाता है।
होली के पहले दिन (चतुर्दशी के दिन) की होली को छोटी होली या सूखी होली कहा जाता है।इसी दिन सेवित गाँव/मोहल्ले/कस्बे के सभी बच्चे और बड़े दिन से ही एक पेड़ या बड़ी टहनी पर, पूर्व निर्धारित स्थान पर, अपने-अपने अपने अवगुणों के प्रतीक के रूप में एक कपड़े के टुकड़े को बाँधा जाता है। पहले ये स्थान गाँव/कस्बे/मोहल्ले से दूर ऐसे स्थान होते थे, जहाँ छोटे बच्चों और नईं-नवेली बहुओं की नजर नहीं पड़ती थी। रात को 8से 9बजे के बीच पूजन के बाद इस कपड़े के टुकड़ों से भरे पेड़/टहनी को आग के हवाले कर दिया जाता था। विशेषता की बात यह होती है कि, आग लगाये जाने बाद फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता।
सुबह तड़के उठकर रात्रि वाले उस स्थान पर गिरी राख को उठाकर इकट्ठा करके, इसी राख से एक-दूसरे को टीका लगाया जाता है। गढ़वाळी भाषा में इस राख को "छारा" या "छारू" कहा जाता है। इसी नाम की वजह से पूर्णिमा के दिन की होली को "छरोळि" (गीली होली या बड़ी होली ) कहा जाता है। आज के दिन होल्यार (होली खेलने वाले) अपने ही घर, गाँव के आसपास होली खेलते हुए एक दूसरे को रंग का टीका लगाकर गीत गाते, नाचते-झूमते गाँव/कस्बे/मोहल्ले भर में घूमते हैं। रंग व पानी से भी एक-दूसरे को खूब भिगाया जाता है।
*पौराणिक और वर्तमान होली के बीच मुख्य अंतर*
कुछ दशकों पहले जब मनोरंजन के लिए टी०वी०, मोबाइल जैसे गैजेट्स नहीं थे तो बच्चे बड़ी उत्सुकता से होली की तैयारी और इंतजार करते थे।
परिवार के बड़े बुजुर्ग बच्चों के लिए बाँस की पिचकारी बनाते थे, तो वहीं परिवार की महिलाएंँ जंगलों से विभिन्न प्रकार के फूल बीन कर लाती थी, जिन्हें सुखाकर और ओखल में कूटकर रंग बनाये जाते थे। इन फूलों में सेमल के फूल से घोलने वाला रंग तैयार किया जाता था। बाजारों में स्याही की टिकिया आ जाने के बाद बच्चों द्वारा इसका प्रयोग भिगोने वाले रंग के रूप में खूब किया जाने लगा। धीरे-धीरे बाजारों में विभिन्न कैमिकल युक्त रंग आ जाने पर प्राकृतिक रंग बनाना लगभग समाप्त सा ही हो गया है। बाँस से बनी पिचकारी तो, (मेड इन चाइना के यूज एण्ड थ्रो प्रोडक्ट्स आ जाने के कारण) संग्रहालयों तक सीमित हो कर रह गई है, क्योंकि बच्चे भी विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी प्लास्टिक से बनी पिचकारी ही पसन्द करते हैं।
जो भी हो बहरहाल समय का प्रभाव हर चीज पर पड़ता ही है, वहीं प्रभाव हमारे आचार - विचार, रहन-सहन व तीज - त्योहारों पर भी पड़ना स्वाभाविक है।
*कुछ ऐसे गांव भी हैं, जहां नहीं मनाई जाती है होली*
*आइये जानते हैं क्यों नहीं मनाई जाती है इन गांवों में होली*
रूद्रप्रयाग जनपद में तीन गाँव ऐसे हैं जहाँ होली नहीं मनाई जाती। ऐसा नहीं कि उन गाँवों के लोग होली के बारे में नहीं जानते, बल्कि वे होली मनाना, चाहते हैं पर..
अगस्त्यमुनि विकास खण्ड के चोपड़ा न्यायपंचायत के गाँव क्वीली- कुरझण में आज से करीब पौने चार सौ साल पहले जम्मू कश्मीर से कुछ पुरोहित परिवार अपने यजमानों और कास्तकारों व मवेशियों के साथ आकर बस गये थे। ये लोग अपने घर-गृहस्थी के सामान के साथ अपनी ईष्ट देवी त्रिपुरा सुन्दरी की मूर्ति भी लाये थे, जिसे गांव में मन्दिर(मण्डुली) बनाकर स्थापित कर दिया गया। त्रिपुरा सुन्दरी को होली का हुड़दंग पसन्द नहीं है, यह मान्यता है। यही मान्यता चली आ रही थी कि लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व कुछ ग्रामीणों ने आसपास के लोगों को होली खेलते, होली खेलने का मन बनाया और होली खेली। तब अचानक इसी क्षेत्र में हैजा फैल गया, जिससे जान-माल की काफी हानि हुई। फिर यह मान्यता ऐसी प्रबल हुई कि अ़भी तक चली आ रही है। आज भी इस गाँव के लोग अपने गाँव में होली नहीं खेलते।गाँव से बाहर रहने वाले यहाँ के वासिन्दे होली खेलते हैं, पर यही लोग जब होली के अवसर पर गाँव में होते हैं तो अपनी परम्परा को दृढ़ता से निभाते हैं।
तर्क-वितर्क कितने भी हों, लेकिन रीति-रिवाजों के साथ परम्पराओं का भी अपना विशिष्ट महत्व है।
लेखक का परिचय :श्री हेमन्त चौकियाल (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० डाँगी गुनाऊँ, ब्लॉक-अगस्त्यमुनि, जनपद रुद्रप्रयाग

जवाब देंहटाएंबहुत ही तथ्य परक लेख
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी
जवाब देंहटाएंबहुमूल्य ज्ञान का प्रकाश!!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुभकामनायें!!
डा. गीता रावत