नव संवत्सर-एक आध्यात्मिक व वैज्ञानिक लेख - श्री हेमन्त चौकियाल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज नव संवत्सरारम्भ के पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री हेमन्त चौकियाल जी का हिन्दू नव वर्ष पर आधारित आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक लेख:- "सृष्टि में जीवन के प्रारम्भ का दिन है, सनातन परम्परा के नव संवत्सर का प्रथम दिन-चैत्र प्रतिपदा




चैत्रमासे जगद् ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेSहनि।

शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति।।


 चैत्रमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिसे नवसंवत्सर का आरम्भ होता है, यह अत्यन्त पवित्र तिथि है। इसी तिथिसे पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण प्रारम्भ किया था। युगों में प्रथम सत्ययुग का प्रारम्भ भी इसी तिथि को हुआ था। इसी दिन सम्राट चन्द्रगुप्त विक्रमादित्यने शकों पर विजय प्राप्त की थी और उसे चिरस्थाई बनाने के लिए विक्रम-संवत् का प्रारम्भ किया था।



यह सनातन धर्म की एक बहुत बड़ी विशेषता है कि इसकी हर परम्परा  के पीछे  कोई न कोई महान उद्देश्य छिपा रहता है और साथ ही छिपा रहता है विशुद्ध वैज्ञानिक तर्क। 

सनातन परम्परा में हिन्दू धर्मावलम्बियों का नव वर्ष चैत्र प्रतिपदा के दिन से प्रारम्भ होता है। आखिर क्या कारण हैं कि हिन्दू लोग अपना नव वर्ष इस दिन से मानते हैं?

 पूरे भारत में इस दिन को अलग-अलग नामों से भाषाई आधार पर पुकारा भले ही जाता हो, लेकिन मूल में सभी की मान्यता नव वर्ष मनाने की, एक ही है।


 *आइये जानते हैं इसके कुछ तथ्य:-*


भारतीय  सनातन धर्म के ज्योतिष ग्रन्थ सूर्य सिद्धांत के अनुसार पृथ्वी की उत्पत्ति लगभग दो अरब वर्ष पूर्व हुई।

ब्रह्मपुराण में वर्णित वर्णन के अनुसार चैत्र मास की शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि को उस अदृश्य, अव्यक्त तथा अविनाशी शक्ति(जिसे सनातन धर्मावलम्बी ब्रह्मा के नाम से पूजते हैं) ने पृथ्वी की रचना की।

यदि उक्त ग्रन्थ में लिखे शब्दों का हम वैज्ञानिक विवेचन करें तो पायेंगे कि- भले ही आज पाश्चात्य  लोग बिना विवेचना किये इन ग्रन्थों को कपोल कल्पित कहते हों, लेकिन ये सत्यता के बहुत निकट हैं। वर्तमान में पृथ्वी सहित ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति को जो सर्वमान्य तथ्य है, वह बिग बैंग सिद्धान्त ही है, (जिसके अनुसार सूर्य में चल रही लगातार रासायनिक प्रक्रियाओं के तहत नाभिकीय संलयन और विखंडन के कारण हुये विस्फोट से अन्य ग्रहों का जन्म हुआ, जो करोड़ों वर्षों बाद ठण्डे होकर, वर्तमान स्वरूप में आये। )

1749 में फ्रांस के खगोल वैज्ञानिक कास्ते द बफन की पुच्छल तारा परिकल्पना भी, पृथ्वी की उत्पत्ति के सम्बन्ध में भारतीय ग्रथों में बताई गई बातों की सत्यता के बहुत निकट है।

 अद्वैतवादी संकल्पना के अनुसार एक ही तारे से सम्पूर्ण ग्रहों की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया है। इसे ही पैतृक संकल्पना भी कहा जाता है। 

इस तरह सनातन  धर्म में ब्रह्मा को सृजक(उत्पन्न करने वाला) कहा जाता है।

अब बात करते हैं सनातन धर्म में पालनकर्ता( विष्णु) के बारे में।

सनातन धर्म में विष्णु को पालनकर्ता के रूप में वर्णित किया गया है, और पृथ्वी को विष्णु पत्नी कहा गया है। (विष्णुपत्नीनमस्तुभ्यं पादस्पर्शक्षमस्वमे।)पानी को विष्णु कहा गया है। पानी का रासायनिक सूत्र H2O है, जो हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु से मिलकर बना है, और यह निर्विवाद सत्य है कि इन दोनों के मेल से ही पृथ्वी पर जीवन है। पानी से ही जीवन सम्भव है। अतः जल को सनातन धर्म में पालनकर्ता (विष्णु) के रूप में सम्मान दिया गया है। पृथ्वी पर जल के कारण ही अन्न व वनस्पतियाँ पैदा होना सम्भव है। अतः इसे विष्णु पत्नी के साथ रत्नगर्भा नाम देकर सम्मानित किया गया है। अतः यह बहुत सम्भव है कि पृथ्वी पर जीवन का प्रारम्भ सनातन धर्म में वर्णित ग्रथों के अनुसार इसी दिन से प्रारम्भ हुआ हो। (इसे अन्तिम सत्य न भी मानें तो एक परिकल्पना के रूप में स्वीकार करने के तो पर्याप्त आधार हैं।)

ब्रह्म पुराण में वर्णित है कि - चैत्रमासे जगद् ब्रह्मा संसर्ज प्रथमे$हनि।

शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये  सति।। 

(अर्थात ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के प्रथम सूर्योदय होने पर की। (यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि प्रथम सूर्योदय....) 

अब इस बात का विवेचन वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर करते हैं कि- हिन्दू धर्म के प्रथम दिन(नवसंवत्सर) 13 या 14 अप्रैल को पृथ्वी अपनी वार्षिक गति के कारण सूर्य से इस स्थिति पर रहती है कि सूर्य की प्रथम किरणें सीधे भूमध्य रेखा पर ही आती हैं, जिस कारण इसे विषुवत संक्रान्ति कहते हैं। इसीदिन से सूर्य उत्तरायण होते हैं। पृथ्वी की इस विशेष स्थिति के कारण सूर्य की किरणों से पृथ्वी पर नव जीवन, नयीं कोंपलें, समशीतोष्ण समीर बहने लगती हैं, जिस कारण पृथ्वी के सभी जड़ (मृतप्राय: सजीव) भी चेतन (नव स्फूर्ति के रूप में जीवन का संचार) होने लगते हैं। अब इस समय सम्पूर्ण पृथ्वी का मौसम सुखद होना प्रारम्भ हो जाता है। शीत ऋतु में मृत पौधे, जीव पुनः शरीर धारण करने लगते हैं।

इसलिए सनातन धर्मावलम्बियों ने इसे अपने नये साल का प्रथम दिन माना। बाद में इस अवसर पर अनेक घटनाओं के जुड़ जाने से यह अन्य कारणों से भी ऐतिहासिक बनता गया।


आइए उन कारणों का वैज्ञानिक विवेचन और विश्लेषण करें कि क्यों इन्ही दिनों सनातन धर्मावलम्बी शक्ति की पूजा करते हैं? 


जब सूर्य मीन राशि से हटकर मेष राशि की तरफ बढ़ता जाता है तो ताप की सर्वाधिक मात्रा विषुवत रेखा के पास होती है, क्योंकि यहाँ दिन व रात की अवधि बराबर होती है। जिस कारण पृथ्वी पर सौर ऊर्जा का आगमन और निर्गमन बराबर रूप में होने से जीवधारियों के लिए आदर्श स्थिति होती है, जिससे  प्रत्येक जीवधारी में नव ऊर्जा के निर्माण के लिए आदर्श परिस्थितियाँ बनती हैं। अतः हिन्दू धर्मावलम्बियों द्वारा इस काल खण्ड में शक्ति (पृथ्वी) की पूजा के साथ साथ नव बीज बापन का भी काम किया जाता है। जीवन व समृद्धि का प्रतीक हरियाली बोने की परम्परा भी उसी गूढ़ विज्ञान का अहम हिस्सा है। 


यह निर्विवाद रूप से कहने के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि हिन्दू नववर्ष संवत्सर पूर्ण रूपेण वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित स्वीकार नववर्ष है। प्रकृति, जिसे साहित्य में स्त्रीलिंग के रूप में स्वीकार किया गया है, के पूजन का दिन नवरात्रि का प्रथम दिन भी यही दिन है। सनातन धर्म में पृथ्वी को माता कहकर सम्मान दिया गया है, क्योंकि माता की ही भांति यह पृथ्वी भी पुत्र-पुत्री के रूप में विभिन्न खाद्य पैदाकर हमारे जीवन का पालन और पोषण करती है, अतः उस माता स्वरूपा पृथ्वी को देवी (माँ) के नौ रूपों (भुवन) में पूजित कर हम अपनी श्रद्धा प्रदर्शित करते हैं। "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की कामना करते हुए, सर्वत्र हरे-भरे होने की कामना, जौ की हरियाली बाँट कर करते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम हिन्दू धर्म के विभिन्न अवसरों पर किये जाने वाले श्रद्धा कर्म को केवल पूर्वाग्रह ग्रसित होकर आलोचना का विषय न बनायें, अपितु वर्तमान व भावी पीढ़ी को उसके पीछे छिपे विज्ञान को जानने के लिए प्रेरित करें। हम योग्य मस्तिष्कों को भारतीय सनातन परम्पराओं पर वैज्ञानिक शोध करने के लिए प्रेरित करते हुए सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना को पल्लवित और पुष्पित करें, ताकि आने वाली पीढ़ी सही रास्ते पर आगे बढ़ कर स्वयं और मानवता का कल्याण कर सके। 


               🙏

हेमन्त चौकियाल(स०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० डाँगी गुनाऊँ 

विकास खण्ड - अगस्त्यमुनी, जनपद-रूद्रप्रयाग 

 

Mail - hemant.chaukiyal@gmail.com


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