पुस्तकालय का महत्व-श्री गजेन्द्र रौतेला

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  विश्व पुस्तक एवं काॅपीराइट दिवस के सुअवसर पर प्रस्तुत है आज जनपद रुद्रप्रयाग  से शिक्षक बन्धु श्री  गजेन्द्र रौतेला जी का लेख:-



पुस्तकालय का महत्व 

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हमारे पढ़ने लिखने के साथ ही हमारे आसपास जो शब्द  तैरते हैं उनमें से एक शब्द लाइब्रेरी या पुस्तकालय भी है। सामान्यतः इसे हम पुस्तकों के एक ढेर या जखीरे के रूप में देखना शुरू कर लेते हैं।ये बेहद औपचारिक और परम्परागत धारणा है हमारे मन की।

लेकिन जहाँ तक स्कूली शिक्षा में लाइब्रेरी या पुस्तकालय का सन्दर्भ है तो मुझे लगता है कि यह एक बहु गतिविधि आधारित रचनात्मक केन्द्र है जहाँ पर बच्चे अपनी रुचि से कुछ भी नया सृजन करने के लिए स्वतन्त्र होते हैं दूसरे शब्दों में कहें तो अपने मन की और मन की जिज्ञासाओं को स्वयं अपने हाथों से करके देखकर तसल्ली कर लेने की ख्वाहिश होती है।

कुल मिलाकर यह कि स्कूली पुस्तकालय एक ऐसा केन्द्र हो जो बच्चों के सवालों के जवाब उन्हें खुद तलाशने में मदद कर पा रहे हों।

 बेशक वक़्त और तकनीक के साथ पुस्तकालय की अवधारणा में कुछ बदलाव जरूर आये हैं लेकिन उसकी मूल अवधारणा अब भी वही है..........जिज्ञासा को जगाना और उसे शान्त करना। शिक्षा के क्षेत्र में देखें तो चाहे NCF 2005 हो या RTE 2009 दोनों में ही पुस्तकालय की जरूरत और आवश्यकता का उल्लेख जरूर किया गया है भले ही उसके संचालन और स्थापना की स्थिति स्पष्ट न हो...........लेकिन  आवश्यकता बरकार समझी गई है यह बड़ी बात है।

अब सवाल यह आता है कि जब इसके लिए प्रावधान हैं तो फिर इसकी स्थापना या संचालन कैसे हो ?? अन्ततः यह हमारी व्यक्तिगत रुचि और concern पर आकर रुक जाता है। दरअसल ज्यादातर हम पुस्तकालय के उपयोग को खुद अपने सन्दर्भ में कम और बच्चों या अन्य पाठक के सन्दर्भ में ज्यादा देखना शुरू कर देते हैं।

 हम यह भूल जाते हैं कि जितना यह बच्चों के लिए जरूरी है उससे कहीं ज्यादा हमारे लिए जरूरी है।

 एक शिक्षक यदि वैश्विक और व्यापक दृष्टि नहीं रखता है तो वास्तव में यह शिक्षा की मूल अवधारणा और उद्देश्य को फलीभूत नहीं करता है और इस सबके लिए जो सबसे जरूरी तत्व है तो वो है हर रोज दुनियाँ में नित नए होने वाली घटनाओं से अपडेट रहना चाहे वो किसी भी विषय या क्षेत्र की हों। यह इसलिए भी जरूरी है कि एक शिक्षक सिर्फ एक शिक्षक भर नहीं होता बल्कि समाज का एक आइकॉन होता है एक ओपिनियन  मेकर होता है। हम माने या न माने उसकी कही हुई बात या तथ्य समाज में अपना असर जरूर रखती भी और करती भी हैं। सही मायनों में देखा जाय तो एक शिक्षक की भूमिका सिर्फ स्कूल में  पढ़ाने-लिखाने भर तक के लिए नहीं होती बल्कि समाज में एक उत्प्रेरक या कैटेलिस्ट के रूप में भी होती है। उसकी कही बात को ज्यादा प्रमाणिक और विश्वसनीय समझा जाता है। इसके मूल में जो बात है वह है उसका सुसंगत तर्कशील और तथ्यात्मक होना। यही वह बात है जो समाज में उसकी एक विशिष्ट पहचान बनाता है। बेशक वक़्त के साथ इसकी चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं लेकिन इस सबके इतर एक नागरिक के बतौर यह हमें अलग पहचान और भरोसा तो दिलाता ही है। अब सवाल यह आता है कि इस कसौटी पर हम स्वयं को कैसे सफल कर पाते हैं तो उसके लिए जरूरी है कि हम स्वयं इस सबके लिए कितना संजीदा हैं और कितने अवसरों को इस सबके लिए तैयार कर पाते हैं। दरअसल यह सारी कवायद तभी सफल हो सकती है जब हम स्वयं पढ़ने लिखने की संस्कृति के पोषक बन सकें। यह हमारे व्यक्तिगत जीवन के लिए भी उतना ही जरूरी है जितना कि पेशेवर जिन्दगी के लिए।  एक सवाल बार-बार यह भी आता है कि आज के इस तकनीकी दौर में गूगल के होते पुस्तकों या लाइब्रेरी की जरूरत ही क्या है??? कुछ हद तक यह बात ठीक भी है लेकिन यह एक सूचना भर तक के लिए ठीक हो सकती है लेकिन इसके दूसरे पहलू पर अगर गौर करें तो एक पुस्तक सिर्फ पुस्तक भर नहीं होती बल्कि इसकी भौतिक उपस्थिति उस दौर के इतिहास को स्वयं बयांँ कर रही होती है चाहे उसकी बनावट हो, छपाई हो या कुछ और। जब हम उसे छूते हैं महसूस करते हैं या उसकी बनावट या लिखावट से गुजर रहे होते हैं तो यह सिर्फ उसमें लिखा पढ़ना भर नहीं होता बल्कि उसकी उत्पत्ति को भी महसूस कर रहे होते हैं बल्कि यूँ कहें कि स्वयं उस दौर को जी रहे होते हैं। उसका  यह अन्तर्सम्बन्ध ही उसमें लिखे हुए को हमारे भीतर तक उतारने में एक अलग अनुभूति देता है जो ज्यादा आत्मिक और स्थाई होता है। इसलिए यह कहना सर्वथा उचित होगा कि जब तक पढ़ने-लिखने की संस्कृति रहेगी तब तक पुस्तकालय की संस्कृति भी कायम रहेगी। कई बार यह सवाल भी आते हैं कि स्कूली किताबों के अलावा अन्य किताबों को पढ़ना गैरजरूरी है। तो इसमें यही कहा जा सकता है कि जैसे हम कुछ चीजों को मजे के लिए करते हैं, जैसे कि खेलकूद जिससे होने वाले फायदे के बारे में अक्सर बात नहीं होती बल्कि बच्चे स्वतःस्फूर्त ढंग से इसमें रम जाते हैं वैसे ही यह पढ़ने-लिखने या लाइब्रेरी वाली भी क्यों नहीं उनके मजे के लिए शामिल हो सकती है ??  इस संदर्भ में हमने लाइब्रेरी या पुस्तकालय का अर्थ बेहद संकुचित कर दिया है यह एक जीवन दृष्टि को विस्तार देने के बजाय सिर्फ अंकों या किसी परीक्षा या प्रतियोगिता तक सिमट कर रह गया है। हम यह भूल जाते हैं कि कई बार जो सवाल बच्चे सीधे-सीधे पूछने में हिचकते हैं उन्हें उन सवालों के जवाब बेहिचक-बेझिझक उनकी लाइब्रेरी या पुस्तकालय से मिल जाते हैं।

       एक बात यहाँ और भी गौर करने वाली है कि हम अपने सामान्य जीवनचर्या में जहाँ हर रोज हर विषय या मुद्दे पर बातचीत या बहस करते हैं चाहे वो राजनीति हो, फ़िल्म हो या खेल आदि वहीं हम कितनी किताबों या लेखकों के बारे में अपनी सामान्य बातचीत के हिस्से में इस पर बात करते हैं  जिसे हम बुक टॉक या किताब पर किस्सागोई करते हुए पाए जाते हैं। ज़रा याद जरूर कीजियेगा कि  आखरी किताब हमने कौन सी पढ़ी थी या किस पर बातचीत की थी सोचिएगा जरूर............बातें बहुत सी बाकी हैं अभी।


अन्ततः आप सभी को विश्व पुस्तक दिवस की शुभकामनाएंँ।📖💐


🙏 लेखक:-गजेन्द्र रौतेला (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि० चमेली

ब्लॉक-अगस्त्यमुनि

जनपद रुद्रप्रयाग



🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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