चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर-श्रीमती रेखा पुरोहित
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में आज भगवान महावीर स्वामी जी की पावन जयन्ती के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती रेखा पुरोहित जी का लेख:-
चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर
भारतीय संस्कृति में वीर की उपाधि दो ही मनुष्यों को दी गयी है प्रथम वीर विक्रमादित्य एवं द्वितीय भगवान महावीर।
कहा जाता है कि जब भी समाज में हिंसा, जाति-पाति का भेदभाव, पशु बलि आदि बहुत बढ़ जाती है तो समाज को सही दिशा व धर्म का ज्ञान करवाने के लिए किसी न किसी महापुरुष का इस धरती पर अवतरण होता है। भगवान महावीर का भी जन्म ऐसे ही समय में हुआ।
जैन धर्म के २४वे तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्म लगभग ढाई हजार वर्ष पहले वैशाली के गणतन्त्र राज्य क्षत्रिय कुण्डलपुर में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को राजा सिद्धार्थ और रानी त्रिशला के यहाँ हुआ था। कहा जाता है कि इनके जन्म के बाद इनके राज्य की उन्नति होने के कारण इनका नाम वर्धमान रखा गया। इनका विवाह यशोदा नामक कन्या से हुआ था तथा कालान्तर में प्रियदर्शनी नामक एक कन्या के पिता बने।
तीस वर्ष की आयु में भगवान महावीर ने संसार से विरक्त होकर राज वैभव त्याग दिया और संन्यास धारण कर आत्म कल्याण के पथ पर निकल पड़े।
12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद उन्हें केैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ।
ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान महावीर ने अपने उपदेशों व प्रवचनों के माध्यम से दुनिया को सही राह दिखाई। 72 वर्ष की आयु में उन्हें पावापुरी में महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ।
तीर्थंकर भगवान् महावीर ने दुनिया को जैन धर्म के पांच पंचशील सिद्धान्त बतायेः- सत्य,अहिंसा,अपरिग्रह,अस्तेय(अचौर्य)और ब्रह्मचर्य|
सत्यः-जो व्यक्ति सत्य की आज्ञा में रहता है वह मृत्यु को तैरकर पार कर जाता है।
अहिंसाः-वे कहते थे कि हमें दूसरों के प्रति वही व्यवहार करना चाहिये जो हम दूसरों से अपेक्षा करते हैं यही भगवान महावीर का जियो और जीने दो का सिद्धान्त है|। उन्होंने समाज को सत्य-अहिंसा का मार्ग दिखाया और अहिंसा को सर्वश्रेष्ठ नैतिक गुण बताया। इस लोक में एक से लेकर पाँच इन्द्रिय जितने भी जीव हैं उनके प्रति मन में दया रखे यही अहिंसा का सन्देश वे अपने उपदेशों से देते हैं।
अस्तेय(अचौर्यः- बिना अनुमति किसी की वस्तु लेना चोरी के सामान है।
अपरिग्रहः-भगवान महावीर कहते हैं कि मनुष्य स्वयं व दूसरों से सजीव व निर्जीव वस्तुओं का संग्रह करता और करवाता है जो उसके दुखों से छुटकारा नहीं होने देता है। दुखों से छूटने का एक मात्र मार्ग अपरिग्रह ही है।
ब्रह्मचर्यः-उन्होंने ब्रह्मचर्य को सर्वश्रेष्ठ तपस्या बताया है। इसको उन्होंने मोक्ष मार्ग कहा है।
तीर्थंकर भगवान महावीर कहते हैं —“मैं सब जीवों से क्षमा चाहता हूंँ। जगत के सभी जीवों के प्रति मेरा मैत्री भाव है, मेरा किसी से बैर नहीं है। मैं सच्चे हृदय से धर्म में स्थिर हुआ हूँ। सब जीवों से मैं सारे अपराधों की क्षमा माँगता हूँ। सब जीवों ने मेरे प्रति जो अपराध किये हैं, उन्हें मैं क्षमा करता हूँ। ”
उनके अनुसार अहिंसा, संयम और तप ही धर्म है। उनके प्रवचनों में धर्म, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, क्षमा पर बहुत जोर दिया गया है। त्याग और संयम, प्रेम और करुणा, शील और सदाचार ही उनके प्रवचनों का सार था।
वर्तमान परिदृश्य पर विचार करें तो दुनिया में हिंसा, आतंक, भ्रष्टाचार, व्यभिचार,असमानता, चोरी-डकैती व्याप्त है। भगवान् महावीर के पंचशील सिद्धान्तों का पालन समाज की इन समस्याओं का निदान कर सकते हैं ये सिद्धान्त आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
महावीर का अहिंसा का सिद्धान्त मन, वचन और कर्म से अहिंसात्मक होने की बात करता है। असमानता की खाई को अपरिग्रह के द्वारा भरा जा सकता है तो अस्तेय की भावना का पालन होगा तो समाज में लूट-चोरी आदि का भय नहीं होगा। समाज में मानसिक और आर्थिक शान्ति स्थापित होगी।
आज वर्षों बाद भी तीर्थंकर भगवान महावीर का नाम उसी श्रद्धा और भक्ति के साथ लिया जाता है क्योंकि उन्होंने इस संसार को मोक्ष का सन्देश दिया और साथ ही मोक्ष को पाने का मार्ग भी दिखाया।
लेखक:-श्रीमती रेखा पुरोहित (स०अ०)
रा० प्रा० वि० सौंराखाल
ब्लॉक-जखोली, रुद्रप्रयाग
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

बहुत सुंदर भगवान महावीर जी की पंचशील सिद्धांत को लेकर, वास्तविक जीवन जीवन और समाज के लिए उपयोगी वार्ता 🙏🙏
जवाब देंहटाएं🙏🏻🙏🏻👍🏻👍🏻
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