रेत की कहानी-
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद नैनीताल से शिक्षक बन्धु श्री विनोद सुयाल जी की कविता:-
रेत की कहानी
पर्वतों के शीष में,
पठारों के बीच में,
नदियों के आँचल में,
सागर की गहराई में,
रची हूँ मैं, बसी हूँ मैं।।
आँधियों में उड़ चली,
बूँदों के संग बह चली,
नदियों की गोद में गिरी,
सागर में मैं समा गई।।
चुन-चुन के मेरी देह को,
जब आशियाने बन गए,
तो हॄदय मेरा खिल गया।
लगने लगा मुझे कि अब,
भाग्य मेरा बदल गया।।
हर नींव में मैं बस गई,
पाषाण में मैं सज गई,
पर काल क्रूर हाथों से,
जब आशियाने ढह गए।
तो भाग्य मेरा रूठ गया,
जो ख्वाब था वो टूट गया।।
फिर दी गई उपमा मुझे,
उन बेजुबान घरौंदों की,
जिन्हें कुछ लोग बनाते हैं।
और समंदर की लहरों से,
बिखरने को छोड़ जाते हैं।।
पर बिखरने के भय से,
घरौंदे रुका नहीं करते,
टूटने के भय से,
आशियाने झुका नहीं करते,
मनुष्य ने रचा है जो,
तो वक्त से ढहेगा वो।।
मर कर भी मैं अमर रही,
क्योंकि मैं नश्वर नहीं।
फिर आशियाँ बनाऊँगी,
घरौंदों को मैं सजाऊँगी,
क्योंकि--- मैं रेत हूँ।।
विनोद सुयाल (स० अ०)
रा० प्रा० वि० भाँकर
ब्लॉक - भीमताल, नैनीताल
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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