माँ गंगा - श्रीमती माधुरी नैथानी

 प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती  माधुरी नैथानी जी की रचना:- माँ गंगा


माँ गंगा



सर्वोच्च शिखर हिमभाल है गंगा, 

सम्पूर्ण राष्ट्र की ढाल है गंगा।

गौमुख धरा पर चरण पखारे, 

वैभवशाली विशाल है गंगा।।


कहीं पर सुन्दर ताल है गंगा, 

कुदरत का कमाल है गंगा। 

मोहनी रूप धरा है ऐसा, 

मंत्र मुग्ध कोई जाल है गंगा।। 


पर रूठे तो विकराल है गंगा, 

पापियों का काल है गंगा। 

चट्टानों पर टंकार है गंगा, 

निरझर्णियों की झंकार है गंगा।। 


वसुधा पर उपकार है गंगा, 

हिमालय का श्रृंगार है गंगा। 

पाषाणों में धमाल है गंगा, 

निर्मल निश्छल कान्ति है गंगा।। 


शान्त स्वभाव की चाल है गंगा, 

औषधि और उपचार है गंगा। 

रत्नों का भण्डार है गंगा, 

तरंग-तरंग उछाल है गंगा।। 


नूतन निस दिन गान है गंगा, 

मधुर संगीत मन भान है गंगा। 

अमृत सरोवर पान है गंगा, 

अनेक गुणों की खान है गंगा।। 


शिव जटा में जाल है गंगा, 

मा भारती दुशाल है गंगा। 

मोक्षदायनी ज्ञान है गंगा, 

सर्वोच्च शिखर हिमभाल है गंगा।। 


रचना:-

माधुरी नैथानी ( स०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० भटोली,

ब्लॉक-खिर्सू, जनपद-पौड़ी गढ़वाल

🙏संकलन - टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

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