नारी-श्रीमती सावित्री आर्य
प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती सावित्री आर्य जी की कविता:
नारी
कभी कहलाती है वो अबला,
कभी हो जाती है बेचारी।
इन दो पाटों के बीच पिसकर
रह जाती है नारी।।
तन को झोंके मन को मारे,
दायित्वों से दूर ना भागे।
फिर भी क्यों दुनिया वालों को,
दिखती उसमें कमियाँ भारी।।
लगती बंदिशें दुनिया भर की,
तुम बेटी हो ये ना करना,
यहाँ ना जाओ वहाँ ना जाना।
वरना हो जाएगी बदनामी,
कहने को तो जगत जननी है,
अन्नापूर्णा घर की लक्ष्मी है।
फिर भी लेकिन उसके हक पर,
डाले डाका दुनिया सारी।।
आजादी क्या होती है,
ये पूछो उस नारी से।
सदियों से जो सहती अाई,
जुल्मों सितम मर्दों के।।
चाहे वह हो रूप पिता का,
भाई का हो या प्रियतम का।
फिर भी हंँसती हर गम सहती,
खुश रखने को दुनिया सारी।।
अस्तित्व ना हो यदि नारी का,
फिर क्या होगा इस सृष्टि का।
सोचो समझो विचार करो,
सारे पापाचार बन्द करो।।
सावित्री आर्य (प्र० अ०)
रा० क० उ० प्रा० विद्यालय छिड़ागांजा
ब्लॉक-भीमताल,
नैनीताल
🙏संकलन :-टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड

Congratulations madam!!
जवाब देंहटाएंAapnai Nari kai chritr ko mjbuti sai ek mala mai pironai ka srahniy kary kiya hai!!
Punh aapko shubhkamnayein!!
नारी की व्यथा को दर्शाती कथा
जवाब देंहटाएंबहुतसुंदर
जवाब देंहटाएंनारी वास्तव में बहुत मजबूत होती है। यही उसका शक्ति रूप दिखाई देता है। सुन्दर रचना
जवाब देंहटाएंअति सुन्दर रचना है ।
जवाब देंहटाएंBahut bahut sunder
जवाब देंहटाएंAti sunder
जवाब देंहटाएंBahut sunder
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत बधाई शुभ कामनाएं
जवाब देंहटाएंExcellent.
जवाब देंहटाएंExcellent
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर रचना
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