ग्रामीण नारी की मर्म व्यथा-श्रीमती बीना रजवार
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती बीना रजवार जी की कविता:-
ग्रामीण नारी की मर्म व्यथा
यह नारी कितने श्रम में जीती जाती,
अविरल कार्यों में व्यस्ततम होती रहती।
सिसकने को तो तनिक भी समय नहीं,
सुख तन-मन का भूल तपती जाती रहती।।
परिवार ज्ञानी हो सो खुद अज्ञान ही रही,
अपनों के सुख हित व सुख भूल ही गई।
खुद अनपढ़ रही है सबको यूंँ शिक्षा दे रही,
कि त्याग क्या होता यह अप्रत्यक्ष बता रही।।
परिवार अस्तित्व हित खुद को यूंँ भूल गई,
दुःख, संकट, परेशानियों को हंँसते सह गई।
धुरी अडिग, अदृश्य स्तम्भ है वह जबकि,
फिर भी कितनी ही उलाहने वह सहती गई।।
विलक्षण भावनाओं से है वह भरी हुई,
अथक परिश्रम सुध नहीं रात-दिन की।
युग युगान्तर अपने कर्मठ हस्त-पदों से,
धरा सदृश पोषित करती नींव परिवार की।।
बीना रजवार (स०अ०)
रा०प्रा०वि०धानाचूली नवीन
ब्लॉक-धारी, नैनीताल।
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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