फिर बेघर हुए धरती के बासिन्दे-डाॅ गीता नौटियाल

📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है आज जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन डाॅ० गीता नौटियाल जी का अपना पर्यावरण बचाओ पर आधारित लेख



फिर बेघर हुए धरती के बाशिन्दे


 हमारी धरती पर सभी जीव-जन्तु, पेड़-पौधे और मनुष्य बसते हैं। जिनका भरण-पोषण इस पृथ्वी पर होता है लेकिन मनुष्य एक ऐसा जीव है जो पृथ्वी से प्राप्त संसाधनों से जीता है परन्तु पृथ्वी का स्वामी बन बैठा है।



भावनात्मक रूप से मनुष्य सारे जीवों को अपने भोग की वस्तु और इस पृथ्वी को अपनी ही परिसम्पत्ति मान बैठा है। इसके जीते-जागते उदाहरण हम सबके सामने हर पल होते हैं।


मनुष्य की अनिवार्य आवश्यकताएँ जल, जंगल और जमीन से जुड़ी हुई हैं। हमारे परिवेश में ये जंगल हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो करते ही हैं साथ में अपने सौंदर्य से हमको अभिभूत कर देते हैं। 

कल्पना कीजिए यदि जंगल इसी तरह धू-धू कर जलते रहे तो आने वाला कल कैसा होगा? 

हाँ तो मैं बात कर रही हूंँ जलते हुए जंगलों की जो कि धू-धू जल कर हमारी आँखों के सामने अपार कष्ट को सहन कर रहे हैं और इसमें बसने वाले जीव-जन्तु अपने बच्चों को छोड़कर अपने अण्डों को छोड़कर इस भयावह संकट से दूर भागते चले जा रहे हैं लेकिन वे जाएँ कहाँ? उन्हें यह पता भी तो नहीं! कुछ दिन पहले जो चिड़िया अपनी सुरीली आवाज से हम सबको जगाती थी, आज वही  चिड़िया आवाज देकर मानो हमसे पूछ रही हैं कि मेरे बच्चे कहाँ हैं?  मेरे छोटे-छोटे बच्चों को,अण्डों को किसने आग के हवाले किया और यह क्या हो रहा है?हम कहाँ जाएँ और क्या करें?

एक और तो हम सब जल, जंगल और जमीन की बातें हर मंच से करते हैं; पर्यावरण संरक्षण की बातें करते हैं क्या यही हमारा पर्यावरण संरक्षण है? 

हमारा पर्यावरण दूषित होता जा रहा है।हमारा पारितन्त्र असन्तुलित हो गया है, जो हमें सचेत कर रहा है कि छोटे-छोटे स्वार्थों के पीछे हम महाविनाश को निमन्त्रण क्यों दे रहे हैं? माह नवम्बर से फरवरी तक गरुड़-उल्लू अण्डे देते हैं जोकि कीड़े- मकोड़े और विषैले जीवों को खाकर पारितन्त्र को संतुलित करते हैं लेकिन अफसोस इस अमानवीय कृत्य में अवश्य ही इन पक्षियों के अण्डे या छोटे-छोटे बच्चे वनाग्नि की भेंट चढ़ चुके होंगे! जो कि पर्यावरण संकट उत्पन्न करने वाला कारक है।


मनुष्य जो सभी जीवों में श्रेष्ठता की बात करता है क्या यही श्रेष्ठता है कि अन्य जीवों को बेघर करके अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए प्रदूषित वातावरण का निर्माण करना और जीव मात्र के जीवन को संकट में डालना! अग्नि की प्रचण्डता ने जंगलों की हरीतिमा, मधुरता एवं मनोहरता को शून्य कर दिया है। जिससे चारों ओर शून्यता का अहसास हो रहा है। यह शून्यता दुनिया को लपटों के साथ हमारे वायुमण्डल में चीखकर पर्यावरण संरक्षण की दुहाई देने वाले बुद्धिजीवियों को ललकार रही है! इस ललकार से बेखबर हमारी सरकार इस महाविनाश के ताण्डव को रोकने में बौनी साबित हो रही है।

जैसे कि विज्ञ है हमारे देश में वनों की सुरक्षा और वनों के संरक्षण के लिए वन मंत्रालय व अनेक विभाग काम कर रहे हैं लेकिन हम यदि वनों की सुरक्षा, संरक्षण व संवर्द्धन ना कर पा रहे हैं तो यह सभी मात्र औपचारिकता है। लगभग हर वर्ष किसी न किसी क्षेत्र में जंगल अग्नि की भेंट चढ़ते हैं। जिससे नई पौध जल कर विनष्ट हो रही है और पुराने पेड़ भी अपने अस्तित्व को बनाए रखने में असमर्थ हैं। यूंँ कहा जाए कि जब तक स्वयं विकसित होने वाले जंगल मनुष्यों की स्वार्थ परायणता से समाप्ति की ओर हैं और पृथ्वी पर अन्य जीव-जन्तुओं और पेड-पौधों का अस्तित्व खतरे में हैं। आग लगाने वाले दानवों की पहचान करना आवश्यक नहीं समझा जा रहा है; तब तक निर्मल पर्यावरण की कल्पना करना बेईमानी ही है। प्रतिवर्ष सरकारी स्तर पर और व्यक्तिगत स्तर पर वृक्षारोपण किया जाता है क्या ये पेड़-पौधे तब तक सुरक्षित हैं जब तक इस प्रकार की लापरवाही को अंजाम दिया जाता रहेगा यह अपने में यक्ष प्रश्न है!


डॉ० गीता नौटियाल  (स०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० बैनोली भरदार

विकासखण्ड- जखोली, 

जनपद-रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड


🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होली - श्रीमती सुशीला थपलियाल

माँ तुम - श्रीमती वन्दना जोशी

गौचर मेला-श्री सरोज डिमरी