श्री जानकी जयन्ती-श्रीमती रीता सेमवाल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  श्री जानकी जयन्ती पावन पर्व पर प्रस्तुत है  जनपद पौड़ी से शिक्षिका बहिन श्रीमती रीता सेमवाल जी का लेख:


श्री जानकी जयन्ती की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ! 💐💐💐💐💐


श्री जानकी जयन्ती 


वन्दे विदेहतनयापदपुण्डरीकं

            कैशोरसौरभसमाहृतयोगिचित्तम्।

हन्तुं त्रितापमनिशं मुनिहंससेव्यं

        सम्मानसालिपरिपीतपराजपुंजम।।

भावार्थ:-परमपुनीत वैसाखमास में शुक्लपक्ष की नवमी तिथि, पुष्य नक्षत्र मध्याह्नकालमें शुभ मांगलिक वेला में विदेह वंश वैजयन्ती जानकीजू का दिव्य प्राकट्य हुआ।



भारतवर्ष में नारी को देवी स्वरूपा माना गया है। एक अलौकिक शक्ति के रूप में भी स्वीकारा गया है। आदिकाल से बहुत सी नारियांँ जो देव रूप में पूजित हैं और आदर्श प्रेरणा स्रोत रही हैं, उन्हीं में से एक आदर्श नारी जो मानव और देव रूप में पूजनीय है वह है माता सीता।

भारतवर्ष में सीता माता की पूजा की जाती है। एक महारानी होने पर भी सीता जी को अनेक दुःख सहने पड़े फिर भी उन्होंने अपने धर्म को मर्यादा के साथ निभाया। वह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की अर्धांगिनी हैं। रामायण की नायिका हैं। 

रामायण की कथा से भारतवर्ष का बच्चा-बच्चा परिचित है। देवी सीता का हिन्दू धर्म में सर्वोच्च स्थान है। ऐसा माना जाता है कि सीता का जन्म पृथ्वी से हुआ था। इसीलिए उनको पृथ्वी पुत्री कहा जाता है। 


भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जनहितकारी भयहारी।

अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी।।


इसके साथ ही वैदेही,  जानकी, मैथलैयी, भगवती, सिया आदि अनेक नामों से सीता जी को पुकारा जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार मिथिला प्रदेश में अकाल पड़ गया, तब राजा जनक ने सोने का हल चलाया तो धरती से माता सीता का जन्म हुआ।


निज इच्छा मखभूमि ते प्रगट भई सिय आय।

चरित किये पावन परम बरधन मोद निकाय।।


 राजा के कोई सन्तान नहीं थी, उन्होंने सीता जी को पुत्री के रूप में स्वीकार किया। सीता जी बचपन से ही अलौकिक गुणों से सम्पन्न थी। राम द्वारा भगवान शिव का धनुष तोड़ दिए जाने पर सीता का राम से विवाह हुआ। सीता का विवाह मार्गशीर्ष मास में पञ्चमी तिथि को हुआ था। इसीलिए शुक्ल पक्ष की पंचमी को "विवाह पंचमी पर्व" के रूप में मनाया जाता है। अपने पति धर्म का पालन करने के लिए सीता जी ने राज महल के सारे सुख धन वैभव छोड़ दिए थे, और पति के साथ 14 वर्ष के वनवास को चली गई थीं। वन में कन्दमूल खाकर कुटिया में रहना और अशोक वाटिका में विकट परिस्थितियों में भी उनके द्वारा अपने शील, धैर्य, सहनशीलता और धर्म का पालन किया गया।  रावण ने उन्हें अपनी कैद में रखा लेकिन सीता को विश्वास था कि श्रीराम उन्हें मान-मर्यादा के साथ वापस लेकर जायेंगे। अयोध्या वापस जाने के बाद भी सीता जी को अनेक परीक्षाओं से गुजारना पड़ा। यहाँ तक कि उन्हें अग्निपरीक्षा तक देनी पड़ी। लंका विजय के बाद श्री राम अयोध्या वापस आये। अयोध्या में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहता है। अचानक जनता में सीता जी के चरित्र पर प्रश्न उठने लगे, जिस कारण श्री राम ने सीता जी का परित्याग कर दिया। सीता जी  को पुनः वन जाना पड़ा। उन्होेंने वाल्मीकि आश्रम में आश्रय लिया, जहांँ उनके लव और कुश दो पुत्र हुए। अश्वमेध यज्ञ के दौरान लव कुश द्वारा रामायण कथा का गायन किया गया।श्रीराम के कहने पर सीता जी को लेकर बाल्मीकि जी राज महल में आए। सीता जी द्वारा राजसभा में धरती माता का आह्वान करने पर धरती फटने के साथ ही सोने के सिंहासन में बैठी धरती मांँ ने सीता जी को अपनी गोद में बैठा लिया, और सिंहासन धरती में समा गया। 

माता सीता की जीवनी से यही प्रेरणा मिलती है और अपेक्षा की जाती है कि आज भी स्त्रियाँ सीता के पावन चरित्र की तरह त्याग, शान्ति, शालीनता, संयम, क्षमा, दया और सेवा का पालन करते हुए अपने दाम्पत्य जीवन को सफलतापूर्वक निर्वहन कर सकती हैं। और समाज में सम्मान हासिल कर सकती हैं।


  लेखिका:-

रीता सेमवाल(प्र०अ०) 

रा० प्रा० वि० नीलकण्ठ       

ब्लॉक-यमकेश्वर,  जनपद - पौड़ी गढ़वाल



🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर लेख मैम, हमारे उत्तराखंड में पौड़ी जिले में सीता माता जी की एक मात्र मन्दिर कोट ब्लाक ग्राम फलशवाडी में है

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