वो पुरानी किताब-श्रीमती दीक्षा जोशी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद नैनीताल से से शिक्षिका बहिन श्रीमती दीक्षा जोशी जी की कविता:
वो पुरानी किताब
वो पुरानी किताब,
जैसे जिन्न का चिराग।
जिसके अक्षरों को पहचान,
मैंने शब्द पढ़े।।
जिसके शब्दों को मिलाकर,
मैंने वाक्य गढ़े।
जिसके वाक्यों को मिलाया ,
और कविताएंँ पढ़ीं।।
जिसकी कविताओं को पढ़कर ,
गुनगुनाया मैंने।
वो पुरानी किताब,
जैसे जिन्न का चिराग।।
जिसकी कहानियों को पढ़कर,
मैंने खुद को जिया।
जिसमें चांँद का हठ देखा,
देखी मुन्नी को गुड़िया।।
गुब्बारे रंगीन थे कविता में,
नन्हीं लाल चुन्नी थी कहानी में।
वो पुरानी किताब,
जैसे जिन्न का चिराग।
जिसे पढ़कर मैं बड़ी हुई
कक्षाओं की सीढियांँ चढ़ी।।
बड़ी होकर डिग्रियाँ भी लीं,
जिसके कारण मैं आज पढ़ाती हूंँ वहीं।
वो पुरानी किताब,
जैसे जिन्न का चिराग।।
🙏रचना:-दीक्षा जोशी( प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० चोरगलिया,
ब्लॉक-हलद्वानी, नैनीताल
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

Bahut sundar
जवाब देंहटाएंBahut achhi orr sundr rachna
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