'माहौल'-श्री विनोद सुयाल जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद नैनीताल से शिक्षक साथी श्री विनोद सुयाल जी की कविता:
*माहौल*
शब्द क्यों नि:शब्द से हैं,
आज के माहौल में।
है आग फिर भी क्यों धधकती,
आज के माहौल में।।
क्यों दरख़्तों के साए में,
पंछी नहीं हैं बैठते।
बस आँधियाँ ही आँधियाँ,
क्यों आज के माहौल में।।
क्यों ज़ुल्म बढ़ता जा रहा,
इंसानियत के दौर में,
बस वेदना ही वेदना क्यों,
आज के माहौल में।।
ख्वाहिशें मंजिल को देखो,
बढ़ती जाती हैं ये क्यों।
दिल की मुफलिसी को देखो,
आज के माहौल में।।
क्यों सिसकती हैं बेटियाँ,
खुद के घिरे माहौल में।
क्यों बन्द हैं किवाड़ सारे,
जुर्म के माहौल में।।
तुम भी पले हो आज तो क्या,
कमी है माहौल में।
वो भी मरे हैं आज तो,
क्या कमी है माहौल में?
तुम जागते हो शान से,
तुम भागते हो शान से।
पर वो क्यों बेचैन हैं,
आज के माहौल में।।
दिल के दरख्तों की दुआ,
वह भी न समझे क्या करें,
इस जिस्म के टूटे हुए,
अरमानों के माहौल में।।
तू तिलिस्मी जामा पहन,
कर दे बदल माहौल में।
हों सब तबस्सुम वादियाँ,
और महक भर माहौल में।।
चैनो-अमन की दास्ताँ,
कुछ यूँ रचें माहौल में।
अच्छा सुनें, अच्छा करें,
अच्छा बनें माहौल में।।
विनोद सुयाल (स० अ०)
रा० प्रा० वि० भाँकर
विकासखण्ड- भीमताल
जनपद- नैनीताल
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

बहुत ही सुन्दर एवं समसामयिक रचना ।
जवाब देंहटाएं