पर्यावरणविद -सुन्दरलाल बहुगुणा जी-श्री गिरीश बड़ोनी -

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है उत्तराखण्ड के पर्यावरण गाँधी स्व० सुन्दरलाल बहुगुणा जी के परिप्रेक्ष्य में जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री गिरीश बड़ोनी जी का लेख:


मौत उसकी है करे जमाना जिसका अफसोस*

यूँ तो दुनियाँ में सभी आये हैं मरने के लिए////////////

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हमेशा ही हिमालय-गंगा के पैरोकार रहे

सुन्दरलाल बहुगुणा जी एक  गाँधीवादी सत्याग्रही, स्वतन्त्रता सेनानी, लेखक, पत्रकार, चिपको आन्दोलन के प्रणेता और पर्यावरणविद थे। बालपन में उनका नाम गंगा प्रसाद रखा गया था। आजादी के आन्दोलन में भूमिगत हुए तब लाहौर में सरदार मान सिंह हो गए थे। आखिर सुन्दरलाल बहुगुणा नाम से विख्यात हुए।



जन्म-9 जनवरी 1927 (गढ़वाल की भागीरथी घाटी का मरोड़ा गांव)

माता–पूर्णा देवी

पिता–अम्बादत्त बहुगुणा

पुत्र और पुत्री -राजीव नयन बहुगुणा ,माधुरी बहुगुणा पाठक और प्रदीप बहुगुणा 

शिक्षा–इण्टरमीडिएट-टिहरी, स्नातक–लाहौर

आन्दोलन/संघर्ष–

राजशाही विरोधी प्रजामण्डल आन्दोलन, 1944 से 1948


लाहौर में भूमिगत जीवन 1945 –1948


नशाबन्दी आन्दोलन-1960 का दशक

चिपको आन्दोलन-1970 का दशक

टिहरी बांध विरोधी आन्दोलन 1990 का दशक

अनशन/उपवास – 

नशाबन्दी आन्दोलन, चिपको आन्दोलन - दो बार, 

टिहरी बांध आन्दोलन–चार बार

हिरासत/गिरफ्तारी /जेल यात्रा –

स्वतन्त्रता आन्दोलन

नशाबन्दी आन्दोलन

चिपको आन्दोलन

टिहरी बांध आन्दोलन

सामाजिक चेतना के आन्दोलन–ग्राम स्वराज, दलित चेतना, वन श्रमिक, भूदान

पद यात्रा–कश्मीर से कोहिमा, हिमालय के आर - पार


पुरस्कार/सम्मान –


फ्रेण्ड ऑफ नेचर-1981

जमना लाल बजाज - 1986

शेर ए कश्मीर–1987

राइट लाइवली हुड –1987

पद्मविभूषण – 2009

मानद डॉक्टरेट डी फिल–1989 रुड़की विश्व विद्यालय


संस्थान स्थापना – ठक्कर बापा छात्रावास टिहरी, पर्वतीय नवजीवन मण्डल आश्रम सिल्यारा टिहरी


प्रेरणास्रोत -श्रीदेव सुमन जिनसे वे बचपन में छुप-छुपकर मिला करते थे।


पुस्तकें –

धरती की पुकार

इकोलॉजी इज परमानेण्ट इकोनॉमी 


राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख


प्रसिद्ध उक्ति/कथन –“धार ऐंच पानी ढाळ पर डाला, बिजली बणावा खाळा–खाळा” अर्थात-पहाड़ की चोटी पर पानी ढलानों पर पेड़, बिजली बनाएंँ हर गाड गधेरा”


शासक याद रखें हिमालय पानी के लिए है रेवन्यू के लिए नहीं।


1948 में राजनीति में सक्रिय हुए और प्रजामण्डल के टिकट पर टिहरी राज्य विधान सभा का चुनाव लड़ा। तब उम्र थी मात्र 21 साल।  हालाँकि जीवन का यह पहला और आखिरी चुनाव हार गए थे। कांग्रेस के सदस्य बने और जल्दी ही जिला महामन्त्री भी। 1956 में जब सरला बहन की शिष्या विमला नौटियाल से शादी की बात चली तब विमला जी ने राजनीति छोड़कर सामाजिक जीवन अपनाने की शर्त रख दी।  मात्र 28 साल के युवक बहुगुणा ने हमेशा के लिए राजनीतिक जीवन छोड़ दिया।


बहुगुणा जी की जीवन धारा को बदलने में उनकी पत्नी श्रीमती विमला बहुगुणा का बड़ा हाथ रहा जिन्होंने उनसे 9 जून 1956 में विवाह ही इस शर्त पर किया कि वे आगे से राजनीति में नहीं बल्कि ग्रामीणों की सेवा में जुटेंगे।  बहुगुणा दम्पति ने सिल्यारा गाँव से अस्पृश्यता -नशाखोरी के खिलाफ आंदोलन से अपने सामाजिक जीवन और आन्दोलनों की शुरुआत की। उन्होंने पेड़ कटान के खिलाफ लोगों को बड़े स्तर पर प्रेरित किया।पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा से प्रेरित होकर चिपको आन्दोलन दक्षिण भारत में अप्पिको आन्दोलन के रूप में फैल गया। कन्नड़ में अप्पिको का मतलब चिपको होता है।

 

वरिष्ठ साहित्यकार विद्या सागर नौटियाल की बहन श्रीमती विमला बहुगुणा को भी उनके सामाजिक कार्यों के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। आखिरी समय में स्वयं बीमार होने पर भी हॉस्पिटल में 89 वर्षीय श्रीमती बहुगुणा अपने पति के स्वास्थ्य के बारे में ही डॉक्टर्स से जानकारी लेती रही। अपने जीवन साथी को उन्होंने ऋषिकेश के पूर्णानन्द घाट पर नम आंँखों से अंतिम विदाई दी!


बहुगुणा जी गाँधी जी के बाद टिहरी जनक्रान्ति के योद्धा श्रीदेव सुमन से प्रभावित रहे और उन्हें गुरु माना। अक्सर भाषणों में वे गाँधी और सुमन को याद करते। उन्हें उद्धृत जरूर करते। गाँधी और सुमन की प्रेरणा से ही उपवास के शस्त्र का कुल 7 बार उपयोग किया।

उत्तराखण्ड के सीमान्त जिलों में 1971 में शराबन्दी और 1000 मीटर से अधिक ऊँचाई पर व्यवसायिक वृक्ष कटान पर उत्तराखण्ड के सभी पर्वतीय क्षेत्रों में 1980 में रोक लगी।


टिहरी बांध पर विशेषज्ञ समितियांँ बनी और कुछ सिफारिशें लागू हुईं। हनुमन्त राव कमेटी की खास चर्चा हुई। हालाँकि  टिहरी में बांध निर्माण से सम्बन्धित लड़ाई वे हार गए परन्तु   बांधों को लेकर बड़ा विमर्श शुरू हो गया और लोग बांधों के नफा-नुकसान पर चौकन्ना होकर सोचने लगे।


हिमालय के पर्यावरण के सवाल को उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाया। जलवायु परिवर्तन, पानी का संकट, विस्थापन और पलायन के मुद्दे निरन्तर उठाते रहे। सभी आन्दोलनों और सामाजिक अभियानों में पूरी टीमें खड़ी की, जिनमें अनेक आज भी निरन्तर समाज में सक्रिय हैं।


वरिष्ठ पत्रकार महिपाल सिंह नेगी कहते हैं - सुन्दरलाल बहुगुणा छोटी उम्र में ही परिपक्व सत्याग्रही बन गए थे और ये परिपक्वता उनके साथ उनके आखिरी समय तक रही। पर्यावरणविद डॉ अनिल जोशी  अपनी बात इस प्रकार से कहते हैं - सुन्दरलाल बहुगुणा विश्व में प्रकृति और पर्यावरण का सबसे बड़ा सिम्बल थे। मैंने अपने जीवन में कभी गाँधी को तो नहीं देखा पर गाँधी को उनमें देखा था।

इतिहासकार प्रोफेसर शेखर  पाठक हिन्दुस्तान समाचार पत्र में सम्पादकीय पेज के कॉलम में लिखते हैं कि- सुन्दरलाल बहुगुणा जी ने बड़ा काम यह किया कि युवा पीढ़ी को समाज व पर्यावरण को दुरुस्त करने की चिन्ताओं से लैस कर दिया। वे आगे लिखते हैं कि सन 1974 में अस्कोट -आराकोट जैसी सुदूर पश्चिम नेपाल से हिमाचल तक की सीमा तक की पदयात्रा हो या टिहरी में हेंवल घाटी में बीज बचाओ आन्दोलन, बहुगुणा की प्रेरणा इसमें अहम रही।


टिहरी बांध निर्माण का विरोध कर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक चर्चा में आये सुन्दरलाल बहुगुणा जी बहुत छोटी उम्र से ही आम आदमी से सम्बन्धित मुद्दों पर मुखर रहे। शराब, वन कटान, अस्पृश्यता, राजसत्ता आदि मुद्दों पर उन्होंने मुखर होकर आन्दोलनों में भाग लिया। टिहरी में भागीरथी और भिलंगना के संगम पर बन रहे बांध का विरोध पहले से ही शुरू हो गया था लेकिन बहुगुणा के इस आन्दोलन में शामिल होने से इसे देश-दुनियांँ में प्रसिद्धि मिली। भले ही वे इस लड़ाई को जीत नहीं सके लेकिन टिहरी में पुनर्वास के प्रश्न को संजीदगी से निपटाने के लिए सरकार मजबूर हुई। सुन्दरलाल बहुगुणा जी न सिर्फ उत्तराखण्ड राज्य बल्कि देश और दुनियांँ के सबसे प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् थे। राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद, प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी, राज्यपाल उत्तराखण्ड श्रीमती बेबी रानी मौर्य,  मुख्यमन्त्री उत्तराखण्ड श्री तीरथ सिंह रावत सहित अनेक गणमान्यों, आम और खास लोगों ने उनके निधन को देश के लिए बहुत बड़ा नुकसान बताया है। 

वास्तव में सुन्दरलाल बहुगुणा जी का जाना एक युग का अवसान  है!


🙏लेखक :-

 गिरीश बड़ोनी (प्रधानाध्यापक) 

रा० आ० प्रा० वि० बुढ़ना ब्लाॅक-जखोली, जनपद-रुद्रप्रयाग


🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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