जनक सुता थी जानकी-श्रीमती सरोज डिमरी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में बैशाख शुक्ल नवमी पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सरोज डिमरी की कविता:


जनक सुता थी जानकी 


विष्णु अवतार श्री राम, 

लक्ष्मी रूप सीता प्रकट भई। 

जनक नन्दिनी जानकी, 

बोलो जय सिया राम की।। 



 जानकी जन्म की कहानी है,

 रोचक बड़ी सयानी है।

 मिथिला पुर के राजा जनक, 

विदेह भी उनका नाम एक है।। 


मिथिला पुर में अनावृष्टि से,

एक बार सूखा पड़ा।

बेहाल प्रजा जन थे,

जन-जीवन जंजाल बना।।


 ऋषि-मुनियों ने राजा को,

सुन्दर एक उपाय सुझाया।

 नगर से बाहर सीमा पर,

 स्वर्ण हल जा चलवाया।। 


राजा रानी ने स्वर्ण हल से,

जहाँ खेत पर हल जोता।

सीत बड़ी धरती पर,

अचरज हुआ अनोखा।। 


 भूमि पड़ी थी सुता सुहानी,

 देख उन्हें हुई  हैरानी।

 धीरज से उसे गोद उठाया।

 सीधे राजभवन पहुँचाया।। 


कन्या रत्न देख मन हर्षाया, 

वर्षा का नजारा मन को भाया।

रौनक नगर में ऐसी छाई, 

कन्या जन्म की बजी बधाई।। 


नामकरण सीता का हुआ, 

सीत पड़ी से सीता हुआ।

जनक नन्दिनी जानकी, 

जय बोलो श्री राम की।। 


🙏रचना:-

सरोज डिमरी (स०अ०) 

रा० आ० उ० प्रा० वि० गौचर ब्लॉक-कर्णप्रयाग, चमोली

🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन उत्तराखण्ड 

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होली - श्रीमती सुशीला थपलियाल

माँ तुम - श्रीमती वन्दना जोशी

गौचर मेला-श्री सरोज डिमरी