अब तो तू मान - श्रीमती बीना कठैत

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती बीना कठैत जी की कविता:


अब तो तू मान 


इस धरा को सबने लूटा,

तभी तो उसका गुस्सा फूटा।

चारों ओर हाहाकार मचाया,

दुनिया को उसने जगाया।।


मत कर तू इतना जुल्म इंसान,

कि धरा पर नहीं रहेगा तेरा निशान।

अब तो तू जाग जा इन्सान,

धरा है तुम सब के लिए वरदान।।


मानव ने अपनी पूर्ति खातिर,

इस धरा पर खूब कहर मचाया।

तभी तो उसने अपना रूप दिखाया,

कहीं बादल फटे, कहीं बाढ़, कहीं तूफान आया।।


धरा ने मानव को फिर जगाया,

फिर भी इन्सान बाज न आया।

अब तो उसने अपना रौद्र रूप दिखाया,

इन्सान को एक बार फिर से जगाया।।


चारों ओर महामारी आई,

अपने साथ कोरोनावायरस लाई।

किसी बहन का भाई गया, किसी माँ बेटा,

किसी पत्नी का पति गया, किसी बाप का बेटा।।


साँसों के लिए सब तड़प रहे,

अपनों के लिए सब बिलख रहे।

फिर भी इन्सान बाज न आया,

तभी तो प्रकृति ने अपना कहर ढाया।।


हे इन्सान अब तो तू जाग,

अब न लगा इस धरा पर आग।

अब तो तू मान,

प्रकृति है हम सब के लिए वरदान।।


🙏रचना:-

बीना कठैत (स०अ०)

 रा०प्रा०वि० मगरू

ब्लॉक-भिलंगना, टिहरी गढ़वाल



🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होली - श्रीमती सुशीला थपलियाल

माँ तुम - श्रीमती वन्दना जोशी

गौचर मेला-श्री सरोज डिमरी