यू ट्यूब पर सम्पन्न वेबीनार की आँखों देखी रिपोर्ट-श्री हेमन्त चौकियाल जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री हेमन्त कुमार चौकियाल जी जी का लेख:-
उत्तराखण्ड के एक हजार पाँच सौ शिक्षकों का दिल जीत ले गये पद्मश्री अरविन्द गुप्ता- श्री हेमन्त चौकियाल जी
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यू ट्यूब पर सम्पन्न वेबीनार की आँखों देखी रिपोर्ट
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गणित, खेल और बच्चे विषय पर अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन की ओर से उत्तराखण्ड के शिक्षकों के लिए आयोजित यूट्यूब बेबीनार में शिक्षकों के साथ संवाद करते हुए प्रख्यात विज्ञान प्रसारक, कबाड़ से जुगाड़ की अवधारणा से हजारों विज्ञान की समझ विकसित करने वाले खिलौनाकार, आई० आई ०टी०कानपुर से इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग स्नातक और यहांँ पाँच साल तक गरीब बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक, तीन हजार से अधिक स्कूलों में कार्यशाला आयोजित करने, बीस देशों के बच्चों के साथ काम करने का अनुभव रखने वाले, 18 भाषाओं में 6 हजार से अधिक मूवीज बनाने वाले, 56 करोड़ लोग जिनके वीडियोज देख चुके हैं, ऐसे बहुमुखी प्रतिभा के धनी पद्मश्री अरविन्द गुप्ता जी के लाइव प्रसारण ने सभी दर्शकों /श्रोताओं के लिए ये क्षण धरोहर बन गईः
श्री गुप्ता ने अपने वक्तव्य की शुरुआत इस बात से की, कि-बच्चों को कुछ भी सिखाने से पहले अनुभव अर्जित करने के लिए खिलौनों से खेलने के मौके दिये जाने चाहिए। अनुभव अर्जित कर लेने के बाद बच्चे के लिए सीखना सरल और आनन्ददायक बन जाता है।
भारतीय गणितज्ञ सुन्दर रो (राव) द्वारा 1883 में लिखी गई पुस्तक "सम इक्शरसाइजेज बाइ ज्योमेट्री बाइ पेपर फोल्डिंग" (Some Exercise By Geometry By Paper Folding) से उद्धृत कुछ उदाहरणों द्वारा उन्होंने बताया कि कैसे हम एक साधारण कागज से बिना चाँदे व प्रकार की सहायता से 120,60,30,15 अंश के कोण बनाना सिखा सकते हैं। ( इन कोणों को बनाने/सीखने में बच्चे को स्वयं कितना आनन्द आयेगा, इसका सहज ही आनन्द लगाया जा सकता है )
कागज के माध्यम से ही उन्होंने एक ऐसा चतुर्भुज जिसके कोण 90 अंश के ना हों, बनाना सिखाया।
आज से 350 साल पहले जर्मन गणितज्ञ फ्रेडरिच गॉस की वो कहानी सुनाई कि कैसे उन्होंने कक्षा 2 में पढ़ते हुए अध्यापक द्वारा 1से 100 तक के अंकों का योग बताने को कहा और गॉस ने पहले(1) और अन्तिम अंक(100)का योग 101, ऐसे ही दूसरे(2) और अन्तिम दूसरे अंक(99)का योग 101,ऐसे ही क्रम में आगे बढ़ते हुए, यह जान लिया कि इसमें बन रहे पैटर्न के अनुसार हरेक युग्म का योग 101 ही आता है। इस प्रकार 1से 100 तक की गिनती के 50 युग्म बनेंगे। अब 50 गुणा 101=5050 इन सभी अंकों का योग हुआ। श्री गुप्ता ने जोर देते हुए कहा कि विज्ञान और गणित विषय के पठन में रटने के बजाय पैटर्न को जानने-समझने की जरूरत है।
उन्होंने सीखने-समझने के लिए एक सूत्र skill are taught, concepts are caught को उद्धृत करते हुए उदाहरण दिया कि अभ्यास से ही किसी कौशल में पारंगत बना जा सकता है।
तीलियों और साइकिल की रबर ट्यूब से उन्होंने विभिन्न ज्यामिति आकृतियाँ बनाकर बताया कि प्रारंभिक स्तर पर कक्षा में बच्चों को इन गतिविधियों को स्वयं करने देने के अवसर देकर उनमें गणित को नीरस विषय मानने की प्रवृत्ति से पार पाना संभव है। पी के श्रीनिवासन की पुस्तक Number fun with the calendar से उद्धृत कुछ उदाहरणों के माध्यम से समझाने का प्रयास किया कि किस प्रकार बच्चों को अवसर देकर गिनती व पहाड़ों को रटने की प्रवृत्ति से इतर पैटर्न समझने के लिए उत्सुक किया जा सकता है।
दीवार पर टंके निष्प्रयोज्य कलैंडर की मदद से हम बच्चों को अंकों की प्रवृत्ति समझने की ओर बढ़ा सकते हैं।
कबाड़ से जुगाड़ तर्ज पर उन्होंने एक पुरानी चप्पल से गिनतारा बनाते हुए बताया कि कैसे हम इसी मॉडल के द्वारा बच्चों को उत्तल व अवतल लेंस के गुण धर्मों का सजीव चित्रण कर अवधारणा को स्पष्ट कर सकते हैं।
झाड़ू की तालियों से उन्होंने बताया कि कैसे हम इनका आड़े और तिरछे रख कर (Horizontal and Landscape) बच्चों को गिनतियों व पहाड़ा बनाने के पैटर्न को समझाया जा सकता है। बच्चों की अवलोकन दक्षता में इजाफा कैसे करें? के लिए उन्होंने एक बहुत ही सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि जब बच्चों को खाली माचिस की डिबिया के अन्दर अधिक से अधिक वस्तुओं को भरकर लाने का टाॅस्क दिया गया तो तब बच्चों ने छोटी से छोटी वस्तुओं जैसे राई के बीज, मिर्च, टमाटर, बैंगन, सिर के बाल, रेत के कण, ... जैसी चीजों के बारे में जाना।
समान कागज के दो टुकडों से लम्बाई व चौड़ाई में मोड़कर बनाये गये बेलन की मदद से श्री गुप्ता ने बताया कि कैसे बच्चे लम्बाई व चौड़ाई के अन्तर से बदलने वाली धारिता के बारे में जानते हैं।
अपनी बेवसाइट पर उपलब्ध 11सौ वीडियोज, जिनमें बच्चे खेल-खेल में विज्ञान की विभिन्न अवधारणाओं को समझते हैं, के बारे में जिक्र करते हुए श्री गुप्ता ने बताया कि अब तक 10 करोड़ बच्चे इन वीडियोज को देख चुके हैं।
कागज से बने मानव कंकाल के माध्यम से उन्होंने समझाया कि कैसे हम मानव में जाति, धर्म, रंग के आधार पर किये जाने वाले विभेद के प्रति समझ बना सकते हैं कि प्राकृतिक तौर पर समस्त विश्व का मानव एक जैसा ही है, लेकिन जाति, धर्म का विवेद बाह्य (मानव कृत) है।
सुदर्शन खन्ना की पुस्तक "सुन्दर सलोने, भारतीय खिलौने" (नेशनल बुक ट्रस्ट) से उद्धृत खेल (प्रयोगों) के द्वारा उन्होंने बताने का प्रयास किया कि बहुत से खेल जो हमारे परिवेश में बहुत पुराने समय से हैं, वे भी विज्ञान के विभिन्न नियमों की अवधारणाओं पर आधारित हैं।
उन्होंने बच्चों के शिक्षण शास्त्र की एक महत्वपूर्ण बात को रेखांकित करते हुए इशारा किया कि बच्चे समूह में तब सबसे जादा सृजनात्मक कार्य करते हैं, जब उन्हें इस बात का कोई भय नहीं होता कि कोई उनका आँकलन कर रहा है या कोई उन पर नजर रख रहा है।
उन्होंने बीस देशों के बच्चों के साथ के अपने अनुभव से कहा कि - यदि हम अपने देश के बच्चों को मौके दें तो वे किसी भी दशा में अन्य देशों के बच्चों से कम नहीं हैं।
उत्तम गोगोई के संचालन में सम्पन्न इस बेबीनार में श्री गुप्ता ने दर्शकों/श्रोताओं के प्रश्नों का भी जबाब दिया। उन्ही में से एक प्रश्न कि कागज के साथ हम और क्या-क्या गतिविधियाँ बच्चों को सिखाने के सन्दर्भ में कर सकते हैं? के उत्तर में श्री गुप्ता ने कहा कि- पी के श्रीनिवासन जी ने चेन्नई से प्रकाशित होने वाले हिन्दू अखबार में श्रृंखला के रूप में 60 लेख प्रकाशित किये, जो गणित सीखने व समझने के ऊपर थे, इन लेखों में श्रीनिवासन ने बताया कि हम कैसे सिक्कों, टिकटों, कलैण्डर NCERT ने इन्ही लेखों को संकलित कर Maths Club Activities के नाम से पुस्तक में प्रकाशित किया है तथा Origami And Maths पर 1883 में लिखी गई दुनिया की पहली किताब, जो "सुन्दर रो" (Sunder Rao) ( भारतीय गणितज्ञ) , की पुस्तक में कागज से विभिन्न आकृतियाँ बनाने की जानकारी है।
इस प्रश्न पर कि - खिलौनों से खेलते समय प्रारम्भिक कक्षाओं के बच्चों को उसके पीछे छिपे विज्ञान के बारे में बताया जाना चाहिए या नहीं? के उत्तर में श्री गुप्ता का कहना था कि पहले तो बच्चों को खिलौनों से खेलने का आनन्द लेने देना चाहिए, खेलने के बाद मन भरने से फिर वे स्वयं ही इस खिलौने की पूरी प्रक्रिया जानने /समझने की कोशिश प्रारम्भ कर देते हैं। इसी कोशिश में वे सिद्धान्त भी समझ लेते हैं या उन्हें समझाया जा सकता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि बच्चों के प्रश्नों के उत्तर उन्हीं को ढूंँढने के लिए प्रेरित करना, सीखने की प्रक्रिया को आनन्ददायक व सीखे को स्थाई बनाता है। अध्यापक की कोशिश होनी चाहिए कि वह बच्चों को अपने आस-पास ही गणित व विज्ञान दिखाये।
श्री अरविन्द गुप्ता जी की आज की बातचीत को निम्न लिंक पर देखा जा सकता है |
https://www.youtube.com/watch?v=2T1k_iuLOGM
श्री अरविंद गुप्ता जी द्वारा लिखित, अनुवादित पुस्तकों के साथ कबाड़ से जुगाड़ के उनके वीडियोज इस लिंक पर जाकर देखे जा सकते हैं।
https://www.arvindguptatoys.com/
🙏लेख:- हेमन्त चौकियाल(स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० डाँगी गुनाऊँ
वि०ख०- अगस्त्यमुनि, जनपद- रुद्रप्रयाग Mail-hemantchaukiyal@gmail.com
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड


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