विषम परिस्थितियाँ - श्रीमती सन्नू नेगी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी की कविता:
विषम परिस्थितियाँ
परिस्थितियाँ विषम हैं समय बड़ा कठिन,
बदल रहा जीवन, मानव बड़ा विकल है।
अदृश्य कोई दानव, है साँसों पर हमला,
डटकर मुकाबला ही, करना भरोसा सकल है।।
क्षण-क्षण साँसे जा रही हैं पल-पल आ रही मौत,
मातम छाया चारों ओर क्या झोपड़ी क्या महल है।
कराहने की आवाजें करे मन को झकझोर,
लम्हा-लम्हा बीत रहा जीने की करनी पहल है।।
सामाजिक दूरी बना उम्मीद की डोरी बाँध ले,
घर के अन्दर ही रह बाहर जग विकल है।
उम्मीदी का दामन थाम है योद्धा सम लड़ना भी,
खुद पर भरोसा रख साँस न करनी विचल है।।
मासूम बच्चे घर में हो गए परेशान,
राह सदा देख रहे कब खुलते स्कूल हैं।
पढ़ने को विवश हैं आये कब वो दिवस,
यही उम्मीद बस सदा मन में करे हलचल है।।
ऑनलाइन पढ़ाई हो तो रही है।
कहीं फोन नहीं किसी के पास डाटा।
घर में न टी०वी० है न कोई कनेक्शन,
सरकार ने दी सुविधा स्वयंप्रभा चैनल हैं।।
🙏रचना:-
सन्नू नेगी(स०अ०)
रा०क०उ०प्रा०वि० सिदोली
ब्लॉक-कर्णप्रयाग
जिला-चमोली
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

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