परिवर्तन-श्रीमती सन्नू नेगी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी की कविता:
परिवर्तन
नव सृजन, नव रूप,
होता नहीं आसान।
छोड़ना पड़ता है कुछ,
छूने को अनन्त आसमान।।
यूँ ही न ये वट वृक्ष,
बना ऐसे ही विशाल।
सूक्ष्म बीज से हुआ,
प्रकृति का ये कमाल।।
तोड़कर बीज को,
धरती फाड़ डाली।
तब कहीं जा कर,
मुस्कुराती है कली।।
परिवर्तन सृष्टि का,
नियम है अविराम।
तोड़कर, कुछ छोड़कर,
मिलता यहाँ नव नाम।।
कई बलिदानों से कुछ,
प्राण बचते हैं यहाँ।
मृत्युलोक है प्राण से,
प्राण बनते हैं यहाँ।।
🙏रचना :-
सन्नू नेगी (स० अ०)
रा० क० उ० प्रा० वि० सिदोली
वि० ख०- कर्णप्रयाग, चमोली
उत्तराखण्ड
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

Lucky Rawat
जवाब देंहटाएंShi kaha ha app ni
जवाब देंहटाएंSahi kha ha app ni
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