बाल श्रमिक - श्रीमती सन्नू नेगी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में बाल श्रम निषेध दिवस पर प्रस्तुत है जनपद-चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी की कविता:
बाल श्रमिक
कॉपी है न किताब,
आँखों में न कोई ख्वाब।
ये बचपन भी क्या बचपन,
दाने-दाने को मोहताज।।
दूर किसी ढ़ेर पर,
अंगुलियाँ कुरेदता मंजर।
ढूँढ रहा निवाला कोई,
तन जिसका जर्जर।।
घूम रहा इधर-उधर,
काँधे पर लटकाए थैला।
पेट की आग बुझाने,
कोई ढो रहा है मैला।।
नन्हें से हाथ, छोटी बाँहें,
कैसे करेंगी अभी से काम।
जिनमें सजती पेंसिल किताब,
मजदूरी करते सुबह से शाम।।
दिन भर रद्दी है ढोता,
सोचे इनमें क्या होता होगा।
रंग-बिरंगे चित्र देखकर,
पल में आसमान छूता होगा।।
हर दरवाजे से तिरस्कृत,
गली की नुक्कड़ से झाँकता।
स्कूल के बच्चों की मस्ती,
चुपके-चुपके है ताकता।।
कब तक बाल श्रमिकता,
चलती रहेगी यूँ देश में।
कब तक बच्चा बचपन में,
घूमेगा मजदूर के वेश में।।
शिक्षा की सुन्दर बगिया में,
इन फूलों को खिलने दो।
किताब कलम की खाद,
माता-पिता को रोजगार दो।।
बाल श्रमिक उन्मूलन जैसा,
जग में पुण्य कोई काम नहीं।
बस्ती-बस्ती और गाँव-गाँव ,
स्कूल से बढ़कर कोई धाम नहीं।।
🙏रचना :-
सन्नू नेगी (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० सिदोली
क्षेत्र- कर्णप्रयाग, चमोली
🙏संकलन :-टीम मिशन शिक्षण संवाद गढ़वाल-कुमाऊँ, उत्तराखण्ड

बहुत सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंहकीकत को बयाँ करती कविता