विश्वास - श्रीमती सन्नू नेगी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-चमोली से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी की कविता :-



विश्वास


ये तो बादल हैं,

इन्हें आँख मिचौली करनी है।

गहन धूप तो कभी,

सघन छाँव भरनी है।।



तू रवि के जैसा बन,

नित कर्तव्य निभाते रह।

बादल हों या घना कोहरा,

पथ पर आगे बढ़ते रह।।


धीरज का आलिंगन हो,

उर में विश्वास हो।

अरमानों के पंख लगा,

उड़ान आकाश हो।।


लक्ष्य क्षितिज की ओर हो,

हौसले पर विश्वास हो।

कर पंखों की होड़ा-होड़ी,

नहीं कभी निराश हो।


वक्त है गुजर जाएगा,

पतझड़ भी सिमट जाएगा।

कर्म पर विश्वास कर,

तरु नवपत्र से भर जाएगा।।


मौसम तो आने जाने हैं,

परिवर्तन प्रकृति का नियम है।

बाद दुख के सुख सवेरा है,

विश्वास का जब संयम है।।


मनुज धरा पर सबसे संयमी,

ईश की अनुपम कृति है।

धैर्य भरा है कूट-कूट कर,

यही मानव की प्रकृति है।।


राम-कृष्ण की सन्तानें हैं,

यूँ ही हार न माने हैं।

धैर्य और विश्वास से लदे,

सारा जग पहचाने हैं ।।


🙏रचना :-

सन्नू नेगी (स०अ०)

रा० क० उ० प्रा० वि० सिदोली

वि०ख०- कर्णप्रयाग, चमोली 






🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

होली - श्रीमती सुशीला थपलियाल

माँ तुम - श्रीमती वन्दना जोशी

गौचर मेला-श्री सरोज डिमरी