कृतज्ञता का पर्व हरेला-श्री हेमन्त कुमार चौकियाल
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री हेमन्त कुमार चौकियाल जी का लेख :-
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का पर्व है हरेला
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भारतीय सनातन परम्पराओं की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि हर पर्व या उत्सव के पीछे जहाँ एक ओर कोई सन्देश छिपा होता है तो, दूसरी तरफ, उसके पीछे विशुद्ध वैज्ञानिकता के साथ कृतज्ञता का भाव भी समाहित होता है।
हरेला भी एक ऐसा ही पर्व है जिसमें सुख, समृद्धि और सम्पन्नता की कामना के साथ प्रकृति पूजन के साथ प्रकृति के प्रति उसके द्वारा प्रदत्त सेवाओं के लिए कृतज्ञता ज्ञापन का भाव भी समाहित है।
आषाढ़ मास के बाद सावन मास के प्रथम दिन को कर्क संक्रान्ति भी कहते हैं। इस दिन से सूर्य उत्तरायण का पथ समाप्त कर दक्षिणायन हो जाते हैं और दिन क्षणिक उत्तरोत्तर रूप से छोटे और रातें लम्बी होने लगती हैं।
सूर्य के दक्षिणायन होने से ठीक दस दिन पहले हरेला बोया जाता है।
आइए जानते हैं क्या है हरेला
इसके लिए किसी शुद्ध स्थान की मिट्टी किसी पात्र में लाकर घर में देव पूजा के स्थान पर रखकर उसमें दस अनाज बोये जाते हैं। पात्र के स्थान पर मालू या तिमलों के पत्तों से बड़े आकार के दोने (पुड़खे) बनाकर भी प्रयोग में लाये जाते हैं। वर्तमान में अनाजों की संख्या में कमी के चलते साथ या पाँच अनाज बोने की परम्परा है। (पाठकों को बताते चलें कि खेती के प्रति उदासीनता के कारण अब कौंणी, चींणा जैसे अनाज तो लगभग समाप्त प्रायः से हो गये हैं, जिस कारण पूरे दस अनाज की किस्में न मिल पाने के कारण सात या पाँच अनाज तक सीमित कर दिया गया है।)
क्या है दस दिन पूर्व दस अनाजों को बौने के पीछे का कारण
दस दिन पूर्व ही अनाज बोने के पीछे दस दिशाओं के प्रति अपनी कृतज्ञता का भाव निहित है। प्रत्येक दिशा का प्रतिनिधित्व करने के रूप में एक अनाज बोने की परम्परा थी, परन्तु समय के साथ दिन तो दस ही हैं लेकिन दस अनाज उपलब्ध न होने पर अनाजों की संख्या में कमी आती जा रही है। इन अनाजों में गेंहू, जौ, चावल के साथ दलहन व तिलहन की फसलें प्रयोग में लाई जाती हैं।
कैसे होता है हरेला पूजन
हरेला के पहले दिन याने आषाढ़ की मासान्त को हरेला की पूजा की जाती है, तथा इसमें उगे खरपतवार को दूर कर लिया जाता है।
सावन की संक्रान्ति को सुबह परिवार के लोग या मुखिया इस हरेले की पूजा करता है, जबकि घर की स्त्रियांँ पकवान बनाती हैं। पूजा स्थल पर म्योळु(एक स्थानीय फल जो लगभग 800 मीटर से अधिक ऊँचाई वाले स्थानों पर मिलता है) के साथ कुणंजा की टहनी (जो एक पादप है और इसमें कीटनाशकता के गुण होते हैं) को धनुषाकार या वृत्ताकार रूप दिया जाता है। इसकी भी पूजा की जाती है। पूजा के उपरान्त इस धनुषाकार या वृत्ताकार आकृति को खेतों में आरोपित कर दिया जाता है तथा यह कामना की जाती है कि दसों दिशाओं में हरियाली और खुशहाली बनी रहे और खेतों में कीट आदि नुकसान न पहुंँचाकर उन्नत फसल पैदा हो।
जहांँ मोळु के पेड़ नहीं होते वहांँ पंय्या, (जो कि वट, पीपल की तरह एक पवित्र पौधा माना जाता है, और पितृ देवताओं का प्रतिनिधित्व करता है) की टहनी को गोलाकार या धनुषाकार का बनाकर खेतों में रोपित कर दिया जाता है।
कहीं-कहीं हरेला की मिट्टी में गाय का गोबर मिलाकर उत्तराखंड के प्रतिनिधि देवता शिव और शक्ति (पार्वती या नन्दा) की मूर्ति आकार, जिसे स्थानीय भाषा में शिव-पार्वती डिकरा कहा जाता है, को भी बनाकर पूजा-प्रतिष्ठा की जाती है। इसे भी मोळु या पंय्या की धनुषाकार /वृत्ताकार आकृति के साथ खेतों में प्रतिस्थापित कर दिया जाता है। कहीं कहीं तो इन मूर्तियों का अवसान खेत में ले जाते ही कर दिया जाता है और उस मिट्टी को खेत /खेतों में बिखेर दिया जाता है।
घर में तथा आस पड़ोस में हरेला से काटे गये अनाज के पौधों और बनाये गये पकवानों को बांँट दिया जाता है, जिसे लोग सिर में रख कर सम्मान देते हैं। पकवान, जिसमें पूरी, पकोड़ी, गुलगुले आदि बनाये जाते हैं प्रेम के साथ प्रसाद स्वरूप खाया जाता है।
🙏 लेखक :-
हेमन्त चौकियाल (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० डाँगी गुनाऊँ
ब्लॉक - अगस्त्यमुनि, जनपद - रुद्रप्रयाग
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड



बहुत सुंदर ,ज्ञानवर्धक लेख ।👌🙏💐
जवाब देंहटाएंधन्यवाद बहिन जी..
हटाएंउत्कृष्ट लेख, श्री हेमंत चौकियाल पर सरस्वती माता की असीम कृपा है। इनके लेख को एक बार पड़कर दोबारा तिबारा पढ़ने का मन करता हैं 💐💐
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय त्रिपाठी जी..
जवाब देंहटाएंआभार सहित धन्यवाद...
हटाएंश्री हेमन्त चौकियाल जी बहुत ही क्रियाशील, आशावादी, कर्मठ, प्रतिभावान ब्यक्तित्व के धनी हैं। ये विध्यर्थियों के प्रति निषठावान, सहयोगी और संरचनात्मक भाव लेते हुए इनको विध्यार्थीपन (जिज्ञासु) को बाहर खींच लाने की महारत हासिल है। इनका ज्ञान भण्डार अद्वितीय है। इनकी ज्ञानगोदड़ी से हमें भी बहुत कुछ सीखने को मिला है। हम इनके अनवरत लेखन और साहित्य सहयोग की हृदय से प्रसंसा करते हुए उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं।
जवाब देंहटाएंधन्यवाद आदरणीय ।
जवाब देंहटाएंआपने बहुत कुछ लिखा है परन्तु मैं तो स्वयं को विद्यार्थी ही मानता हूं और अपने ही विद्यार्थियों से सीखने की कोशिश करता हूं।
अगर आपको मुझमें उपरोक्त वर्णित कुछ दिखा है तो उसका भी बहुत कुछ श्रेय मेरे छात्रों को ही जाता है, जिनसे मैं कुछ सीख पाया हूं।
यदि अन्यथा न समझें तो परिचय भी दीजिएगा.
चाहें तो
hemant.chaukiyal@gmail.com
पर या मेरे w/a न० पर भी परिचय दे सकते हैं।
आभार सहित धन्यवाद...