धरा का रूप अनोखा - श्रीमती सुषमा नौटियाल

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है जनपद- देहरादून से शिक्षिका बहिन श्रीमती सुषमा नौटियाल जी की कविता  :-


*प्रकृति "धरा का रूप अनोखा"*


इस धरा का है रूप अनोखा,

ये धरती है एक झरोखा।।

कहीं दिन सुन्दर रूप छटा है,

कहीं रात अनोखी काली घटा है।।



कभी सावन की मतवाली घटा है,

कभी जून तपती धरा है।

ये धरा है एक स्वप्निल झरोखा,

इस धरा का है रूप अनोखा।।


कभी सुन्दर वसन्ती प्रसून खिले हैं,

कभी धरा पर नुकीले शूल उगे हैं।

सावन भादों की फुहार यहाँ है,

तो वासन्ती मनुहार भी यहाँ है।।


आश्विन, कार्तिक की फसलें लहलहातीं,

धरती सुत की बाछें खिल जाती।

मई, जून की गरमी तड़पाती,

दिसम्बर, जनवरी की ठण्ड कँपकपाती।।


कभी कल-कल छल-छल बहते गाद, गदेरे,

तो कभी सूखी धूल के बादल घनेरे।

कभी चौमासे की खूब हरियाली है,

कभी ग्रीष्म की रूखी बदहाली है।।


कहीं बाग-बगीचे खुशहाल खड़े हैं,

तो कहीं खण्डहर सुनसान पड़े हैं।

कहीं घटा है शोला शबनम,

कहीं धरा का है रूप अनुपम।।


पक्षियों की खूब चहचहाट यहीं है,

तो निर्जन वनों की चरमराहट भी यहीं है।

आस भरी सुन्दर प्रभात भी यहीं हैं,

तो रूखी-सूखी शाम भी यहीं है।। 


यहाँ है सुन्दर दिन की उजियारी,

तो यहीं है बुरी रात अँधियारी।

इस धरा का है रूप अनोखा,

ये धरती है एक झरोखा।।


🙏रचना :-


सुषमा नौटियाल (प्र०अ०)

रा०प्रा०वि० बनियावाला

 वि०ख०- सहसपुर, देहरादून


🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

टिप्पणियाँ

  1. प्रकृति के विभिन्न रूपों को कविता में आपके द्वारा सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है 👌👌🙏

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