बरसात - श्रीमती सन्नू नेगी जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद चमोली  से शिक्षिका बहिन श्रीमती सन्नू नेगी जी की कविता :-

बरसात

तप रही धरा ताप से,

अकुला रही थी भाप से।

टप-टप गिरती बूँदें,

भिगो रही बरसात से।।



झुलस रहे थे विटप,

बढ़ रहे सरपट वे।

रिक्त हुए थे जल संचय,

भर रहे झटपट वे।।


हाथ माथे रख बैठा किसान,

खेत खलिहान भाग रहा।

बाली थी तड़फ रही,

जीवन्त होते देख रहा।।


निर्जल हुई धरती पर,

कंकड़ आँखें थे देख रहे।

बरखा की बूँदें उन पर,

चादर हरी बिछा रहे।


बन्द पड़े थे छाते,

इन्द्रधनुष सम हो गए।

फुदक-फुदक युगल संग,

बरखा के हो गए।।


झम-झम आती बारिशें,

तन-मन भिगो रही।

प्रेम मिलन की ख्वाइशें,

नव युगल को बुला रही।।


🙏 रचना :-


सन्नू नेगी (स०अ०)

रा० क० उ० प्रा० वि० सिदोली

वि०ख०- कर्णप्रयाग, चमोली

उत्तराखण्ड





🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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