ज्ञान पुञ्ज (गुरु) - श्री अर्जुन नाथ जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में  प्रस्तुत है जनपद-पिथौरागढ़ से शिक्षक साथी श्री अर्जुन नाथ जी की कविता:-


ज्ञान पुञ्ज (गुरु)


अध्यापक के रूप में,

ज्ञान पुञ्ज हैं गुरु,

विद्या के वह भण्डार आप,

जिनका न अन्त ना ही शुरू।।



ज्ञान का दीपक रोज जलाकर,

 विद्वान मनुष्य बनाते हैं।

ज्ञान पुञ्ज बनकर हमारे, 

जीवन को चमकाते हैं।।


ईश्वर के प्रतिरूप गुरू हैं,

खुद जलकर हमें बनाते हैं।

अज्ञानता के भवसागर से, 

हमें बचाकर लाते हैं।।


बीमारी की इस आँधी में, 

हर कोई प्राणी बेचैन।

पर ज्ञान की अलख जगाकर,

सकल जगत को दिया है चैन।।


खुद को झुलसा कर भी तुमने,

सबको एक सन्देश दिया।

उठो, जागो और कर्म करो,

 कहकर जीवन ज्ञान दिया।।


यूँ ही कबीर ने बड़ा नहीं कहा,

समाज के सम्बल भी हैं आप।

ज्ञान से अज्ञान के,

पहाड़ को उखाड़ते आप।।


बारम्बार नमन है तुमको,

जो कहूँ वह कम पड़ जाय।

जिसने गुरु की संगत पाई,

उसका जीवन सफल हो जाय।



🙏रचना:- 

अर्जुन नाथ (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि०- मूनाकोट

वि० ख०- मूनाकोट

 जिला- पिथौरागढ़


🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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