पापा की राजकुमारी - श्रीमती पूनम भट्ट
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-टिहरी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती पूनम भट्ट जी की कविता:-
पापा की राजकुमारी
मैं पापा की राजकुमारी,
छुटपन से ही पापा की प्यारी।
पापा से हर पल लिपटी रहती,
करेंगे सब कुछ पापा कहती।।
पापा मुझको अब नहला दो,
पापा मुझको अब गोदी लो।
पापा अब मुझे सुला दो,
पापा अब मुझको पढ़ा दो।।
पापा जब ऑफिस को जाते,
मुझको संगी-खिलौने ना भाते।
भैया, दीदी पर दिन भर में,
पापा से डाँट की धौंस जमाती।।
शाम को जब पापा आते,
तब मैं फिर से खिल-खिल जाती।
घर में सबकी शिकायत करके,
एक-एक को डाँट पड़वाती।।
पापा भी मेरे झूठ-मूठ का,
हर एक को डाँट लगाते।
मैं खुशी के मारे उछल-उछ कर,
पापा के गले से लिपट जाती।।
काश ! वो बचपन लौट के आता,
मैं पापा की छोटी बन जाती।
फिर से पापा के संग रहती,
मैं पापा की राजकुमारी बन जाती।।
🙏रचना:-
श्रीमती पूनम भट्ट (स० अ०)
रा० प्रा० वि० वीड,
वि०ख०- चम्बा, टिहरी-गढ़वाल
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

अति सुंदर रचना... ,बचपन का स्मरण हो गया.... लेख जारी रखें 🙏
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद 🙏
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