गढ़वाळि भाषा पाठ्यक्रमै समीक्षा-श्री गिरीश बड़ोनी जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद-रुद्रप्रयाग गढ़वाल से शिक्षक साथी श्री गिरीश बड़ोनी जी की समीक्षा :-
गढ़वाळि भाषा पाठ्यक्रमै समीक्षा
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आज जबकि सैरी दुन्यां मा य चर्चा होणी छ कि मनखि का विकासा दगड़ी ,भौगोलिक ,सामाजिक ,सांस्कृतिक अर राजनीतिक कारणों से, आवगमन क साधनों कि सहज उपलब्धता कि वजै से अर संचार का साधनों कि खूब हाम होण से जख स्थानीय भाषाओं का दगड़ा-दगड़ी अस्थापित भाषाओं तैं बि खतरा ह्वेगी तखि दुन्यां तैं जोणण वाळी अर अधिक मात्रा मा साहित्य रचण वाळी भाषाओं को बिस्तार जादा ह्वेगे।
हमारी गढ़वाळी भाषा बि भौत तेजि से हमारा लोक से भैर होणे स्थिति मा ऐगे ! हम लोग अपणा लगभग सबि औपचारिक कामों मा गढ़वाळी भाषा को परयोग ना का बराबर छन कना। कुछ अनौपचारिक बातचीत जरूर गढ़वाळी मा होणी छ पर भौत कम। सोशल मीडिया का ये दौर मा जादा लोग बड़ी भाषाओं को हि परयोग करदन अर बोल्दन। कुछ लोग जरूर यकसार लग्यां छन कि क्वी जुगत हो कि हमारि भाषा न सिर्फ बच्चों बल्कि इथगा दमदार हो कि संविधान कि आठवीं सूचि म सामिल ह्वे जौ। गढ़वाळी भाषा मा खूब साहित्य रंच्यों छ अर आज बि रंच्योंणों छ पर आम लोखु तक येकि पौंछ नि छ। केै त लोग गढ़वाळी साहित्य पढदे नि छन अर नई पीड़ी त बोलण मा शरमांदि बिछ अर तौंतैं माहौल बि नीछ।
अपड़ी दुधबोलि क परति यन अन्ध्यरा म उजाळु दिखोन्दि एक अलख जु गढ़वाळ का एक सांस्कृतिक केंद्र पौड़ी बिटि जगाये गै। यांकु श्रेय पौड़ी क जिलाधिकारी महोदय श्रीमान धीरज सिंह गर्ब्याल जी तैं जान्दू, जौंन पौड़ी क अधिकार्यों अर साहित्यकारों से बात करिक अपणी दुधबोली को मान बढ़ौणा का वास्ता पौड़ी मा कक्षा एक से पांच तक का पाठ्यक्रम मा गढ़वाळी भाषा को पाठ्यक्रम सुरु करण क खातिर भौत ठोस काम करे।
दरसलम भाषा तैं अगनै औंण वळि पीड्यों तक पौंछोणु भौत जरूरी छ अर बाळौं क बस्ता पर गढ़वाळी भाषा कि किताब होणा को मतबल छ घर म बि गढ़वाळी पर चरचा होणी अर यें भाषा तैं परिवार अर समाज कि नजर मा महत्व मिलणु। कक्षा एक से पांच तक क खातिर तैयार करी यों किताब्यों पर नज़र डालदा हि सबसे पैलि पंचि किताब्यों का आवरण पिरिष्ठ पर छपीं हमारि संस्कृति व परम्परा की द्योतक धगुलि , हँसुळि, छुबकी, पैजबि अर झुमकि कि तसबीर व नौं देखीक परांण हरषै जांदो अर मन मा यों किताब्यों तैं पढ़णै कि उत्सुकता बढ़दी जान्दि।यों पाठ्य पुस्तकों का निर्माण मा संकल्पना श्रीमान धीराज सिंह गर्ब्याल जी ,जिलाधिकारी गढ़वाल की, संयोजन प्रख्यात साहित्यकार अर धाद गढ़वळि मासिक पत्रिका का संपादक गणेश खुगशाल ' गणी" जी को छ अर नोडल अधिकारी श्री हरेराम यादव जी जिला शिक्षाधिकारी (माध्यमिक) पौड़ी गढ़वाल छन। लेखन मण्डल मा गढ़ गौरव नरेंद्र सिंह नेगीजी का साथ मा जु नौं छन तौं सबुको गढ़वाळी साहित्य सिरजन म महत्वपूर्ण योगदान छ।किताब्यों कु चित्रांकन बि भौत सुंदर छ।
शुरुआत मा " अपणी भाषा वास्ता" शीर्षक मा माननीय मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड श्री त्रिवेंद्र सिंह रावतजी कि बात छ जैमा तौंन लोकभाषों संरक्षण अर संबर्द्धन कु महत्व त बताई छ साथ मा युबि बोले कि उत्तराखण्ड मा नौकरि कन वाळा अधिकार्यों,वकर्मचार्यों तैं बि उत्तराखण्डे भाषों को ज्ञान होण चेैन्द जैसे सि वों तैं यखा परिवेस्, रैन-सैन, बात व्यवहार आदि चीजों तैं समझण मा आसानी रालि अर वो लोखु कि बात भलि करि समझी अपड़ो काम बेहतर ढंग से करि सकला।
"हमारि भाषा" नौं से जिलाधिकारी गढ़वाल श्रीमान धीराज सिंह गर्ब्याल कु संदर्भ छ जैमा तौंन यूनेस्को जना वैश्विक संगठन द्वारा उत्तराखण्डै भाषों तैं दुनियां से मिट जाण वाळी भाषों कि श्रेणी म रखणा परती खबरदार करी चेताये। लोक का ज्ञान, विज्ञान अर संस्कृति कि बेहतर समझ मा भाषा को महत्व बतौन्दा तौंन यो बि उल्लेख करे कि "य भाषा कि हि तागत छ कि मि अपणी बात हिन्दी मा लिखी गढ़वाळी म अनुवाद करै छपवाणौ छौं"।
शुभकामना रैबार मा रुद्रप्रयाग जिला का जिला मजिस्ट्रेट श्रीमान मंगेश घिल्डियाल जिन लिखे कि गढ़वाळी पढ़ण से हम सणी पता चलि सकलो कि कै शब्द का खातिर अलग-अलग जगों मा क्य बोलाये जान्दू अर बानि-बानी कि गढ़वाळी बि लगातार लेखण अर पढ़ण से इकसार ह्वे जालि। श्रीमान मंगेश घिल्डियालजि द्वारा रुद्रप्रयाग का कै शैक्षिक व सांस्कृतिक कार्यक्रमों मा गढ़वाळी मा अपणि बात रखण से पता चलदु कि तौंको अपणी दुधबोली का परति कथगा पिरेम अर लगाव छ। चुनाव क दौरान बि प्रशिक्षण कि सुरवात तौंका द्वारा गढ़वाळी मा सबुकु अभिनन्दन करिक करेैगे ,सतेंद्र भण्डारीजि का इस्कूल कोट तल्ला मा गढ़वाळी भाषा मा डीएम साबन अनुश्रवण लिखे अर अश्विनी गौड़जि का इस्कूल पालाकुराळी कि लाइब्रेरीक बि गढ़वाळी मा संदेश लिखीक एक सुन्दर व प्रेरणादायक पहल करे। कक्षा एक से पांच तलक कि यों किताब्यों का निर्माण मा प्रख्यात साहित्यकार अर धाद का संपादक गणेश खुगशाल "गणी" जी संयोजन कि भूमिका मा छन अर पूरा निर्माण मा तौंकि कार्यशैली, सामग्री चयन, अर भाषा पर मजबूत पकड़ साफ दिखेणी छ।"
भाषै पवांण" शीर्षक का अंतर्गत गणीजिन यों किताब्यों कि अलग्यार, सुरवात, सोच अर निर्माण मा सहयोगकर्ताओं को जिकर कर्यों छ। यों किताब्यों तैं पढ़ण का बाद मैन यन समझे। -------------------
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धगुलि
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कक्षा एक कि किताब कु नौ कोळ्यांस बाळौं कि कोंगळी हाथ्यूँ पर पैरेण वाळी धगुलि पर छ। कै जगा ये आभूषण का खातिर धागुलि बि बोल्दन अर देवि-द्यबतौं का पस्वौं का हातु पर धागुला सजदन जु धगुलि या धागुलि से बड़ा होंदन। यें किताबि मा प्रार्थना का बाद भौत हि आकर्षक चित्रों का साथ मा अ से अरसा बिटि सुरु ह्वेक स्वर अर व्यंजनों कि जाणकारी छ, गाजा-बाजा कविता मा हमारा लोक वाद्य यन्त्रों कू इना शब्दों मा वर्णन छ जन बुले सि अबि होन बजणा ! बोलि-भाषा कविता मा बि हमारा आस-पास का गाजी-चखुल्यों कि बाच पढ़ी अर सुणीक बाळा रंगमत ह्वे जाला ! आखिर मा "भानु बुगठ्या" चित्रकथा भौत हि मजेदार छ। कवितों अर पाठों का अन्त मा शब्दार्थ बि दियां छन जु न केवल बच्चों तैं बलकण मा बड़ोंक तैं बि भौत उपयोगी छन। कुल मिलैक यीं किताब तैं पढीक यनु लगि जनु हथु म धगुलि पैरी कोंगळि हथगुळि समणि खुलिगे हो !
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हं हंसुळि
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हंसुळि हमारो एक यनु आभूषण छ जु बाळौं तैं अक्सर अफरा ममाकोट बिटि नाना-नानी, मामा-मामी, कांणसी मां या जेठि मां द्वारा दिये जांद ! कै जगा गळा पर पैरेण वाळा ये जेवर तैं खग्वाळि या खग्वाळु बि बोल्दन। ये तैं दानि-स्याणि माँ-बैणि बि पैरदन। कक्षा द्वी कि हंसुळि नौंकि यें किताबि मा सरसुती वन्दना का बाद लीसे ब्योलि लोककथा छ जु एक ढोलि बांदर कि कथा छ। कथा इतना रोचक छ कि क्य ब्वले जौ ! कौथगेर कहानि कुछ-कुछ मुंशी प्रेमचंद कि ईदगाह कहानि जनि छ, राजकुमार अर चालाक बुढड़ि लोककथा सुंदर छन। स्याळो ब्यो ,बाछि अर रिक्क कविता और कुम्भा राणी बाल लोकगीत चित्रों का साथ गाण तैं अच्छि छन त गौं कि खुद यात्रा वृतांत मा खुदेंयां शुभमैंकि रुवा -रु जिकुड़ी मा भारि कळकळि लगै देन्दि ! गौरा देवी का ऐतिहासिक व्यक्तित्व कि जाणकारि का दगड़ा हंसुळि का पाठ पूरा होंदन अर हंसुळि (कि चांदी) हौर बि चमकण बैठि जान्दि !
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छुबकि
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कक्षा तीनाकि पाठ्यपुस्तक कु नौं छ छुबकि। गढ़वाळी गीत-संगीत का पर्याय नरेंद्र सिंह नेगिजी की सुप्रसिद्ध सरसुति वन्दना " तेरा मंदिर मा द्यू बळ्यूं " का साथ सुरु ह्वेक अरज, माँ मिन नन्नी क गौं जाण ,मोबैल अर काम -धाम कविता यें किताबि मा छन। गैथै डाळि भौत हि मार्मिक लोककथा छ त सर्ग ददा पाणी-पाणी लोककथा नणद -भौज अर द्वी जोड़ि बळ्दौं दगड़ी तौंका ब्यौहारै सबक सिखौंण वाळी लोककथा छ। गढ़वाळ अर गढ़वळि पाठ मा राजा अजयपाल, तैकि वीरता, न्यायप्रियता अर गढ़वाळि भाषा तैं राजभाषा बणोणकु जिकर छ। सबसि बाद मा महान क्रांतिकारी श्रीदेव सुमन का ऐतिहासिक व्यक्तित्व कि जाणकरि आकर्षक चित्रों का साथ मा दिनी छ।
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पै पैजबि
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पैजबि या पैजि नौन्यों / महिलाओं को जेवर छ जु खुट्यों मा पैरे जान्दि। कक्षा चार कि पैजबि नौं से बणी पाठ्यपुस्तक मा प्रभात को परब जागर से सुरवात छ।चैत से लेक फागुण तक मैनों पर आधारित " रितु म रितु को रितु भली" बड़ो प्यारो रितु गीत छ त बेटि पढावा अर चखुलि कविता बि छन। नरेन्द्र सिंह नेगी जी को सुप्रसिद्ध पर्यावरण गीत-आवा दिदा भुलौं आवा नांग धरति की ढकावा... "डाळी रोपा पुन्न कमावा " कक्षा मा गयेक बच्चों तैं भौत सुंदर संदेश देन्दो। जन बुतिल्या तन कटिल्या लोककथा और मनखि अर विज्ञान निबंध चिंतन मनन का लैक छन। यीं किताबि मा गढ़वाळी भाषा मा आणा, पखाणा अर मैणा का महत्व कि जाणकारि देन्दो एक बड़ो महत्व को पाठ छ। नाटक छौळ हमारा समाज मा आज बि अंधविश्वास कथगा जम्यों छ ये तैं दरसौंदो।
ऐतिहासिक व्यक्तित्व ,पेशावर नायक,विश्व युद्ध का वीर, वीर चन्द्र सिंह गढ़वाळी पर आधारित जाणकारि चित्रों का साथ मा आसानी से समझ मा औंन्दि।
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झुमकि
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जमानों बिटिन नौन्यों अर जनांन्यों को मनपसंद कन्दुड्यों पर पैरेण वाळु गैणु -तगादु छ झुमकि। कै जगा ये तैं झुमका बि बोल्दन। कक्षा पांचकि किताब येही नौं पर च अर किताबि का मुखपृष्ठ पर या झुमकि ही छपीं च। प्रार्थना से किताबि का पाठों कि सुरवात छ। फ़ुर्र फतैं मेरि कुंडली कथैं किसाण मूसा अर अळकसि मूसि की लोककथा पढीक तैं अपणा बाळापन मा सुण्या किस्सा कान्यों दगड़ दादी-नानियों कि मुखड़ी समणी ऐ जान्दि। जूनिन पूछि सूरज तैं कविता म जून अर सूरज को संवाद बच्चों का खातिर भौत रोचक छ। बणाग नाटक भौत ही मर्मस्पर्शी छ ! मि बि चांदु कविता मा बच्चों का मन मा उपजदा स्विपनौं को वर्णन छ कि सि कै परकार से पिरेरणा लेकि चन्द्र सिंह, माधो सिंह, गबर सिंह, जसवंत सिंह, कालू मेहरा, श्रीदेव सुमन, केशरी नन्द, जयानन्द भारती, तीलू रौतेली अर राणी कर्णावती बणण चांदन। रंग मा भंग कहानि मजेदार छ त नारंगी डाळि कविता का माध्यम से डाळ्यों का फैदा बतायां छन। मेरि डायरि का पन्ना पाठमा बच्चोंक तैं डायरि लिखणो कु ढंग बतायों छ। लोकप्रिय लोकगीत सात समोदर पार छ जाण ब्वे चित्रों का साथ मा पूरु असर छ छोड़णो। आखिर मा बीरबाला तीलू रौतेली का शौर्य अर साहस पर आधारित चित्रकथा न केवल उत्साह को संचार करदे बल्कि जिकुड़ि तैं भिजै बि देन्दि।
कक्षा एक से पांच तकैकि यि किताबि भौत सरल ,सहज भाषा मा और चित्रों का साथ आकर्षक छन।पाठों का अन्त मा शब्दार्थ, पाठ बोध, भाषा बोध, क्रियाकलाप, कल्पना करा आदि गतिविधि पाठ तैं हौर अच्छा ढंग से समझण मा मददगार छन। किताब्यों मा बड़ा-बड़ा आखर, बढ़िया कागज अर मनमौंण्या चित्र बच्चों का खातिर भौत हि भला छन।
गणेश खुगशाल "गणी" जी का संयोजन मा लेखक मण्डला सदस्यों तैं गढ़वाळी साहित्य का पुरोधा आदरणीय नरेन्द्र सिंह नेगिजी की उपस्थिति अर मार्गदर्शनन निश्चित रूप से प्रोत्साहित करि होलु ! साहित्यकार बीना बेंजवालजी कि सौ सलाS ये सुफल प्राप्त करण मा महत्वपूर्ण रै ह्वेलि। लेखक मण्डल का हौर सदस्यों गिरीश सुंदरियाल, धर्मेंद्र सिंह नेगी, डॉ जगदम्बा प्रसाद कोटनाला, हरीश जुयाल "कुटज", रिद्धि भट्ट, मनोहर चमोली "मनु", नवीन भट्ट, यतेंद्र गौड़, शिवदयाल "शैलज", देवेंद्र उनियाल, रमेश बडो़ला, महेंद्र ध्यानी अर मधुसूदन थपलियाल जी को ये पाठ्यक्रम निर्माण कारिज मा योगदान प्रशंसनीय छ ! बहुत ही खूबसूरत चित्रांकन का खातिर राकेश "राका , डॉ बी० एस० नेगी, प्रदीप रावत अर आशीष कुमार बधाई का पात्र छन !
🙏समीक्षक:-
गिरीश बड़ोनी (प्रधानाध्यापक)
राजकीय आदर्श प्राथमिक विद्यालय बुढ़ना लस्या,
ब्लॉक- जखोली, रुद्रप्रयाग
(ये समीक्षा चिट्ठी- पत्री 2020 और धाद के जून 2021के अंक में भी प्रकाशित है )
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड






Good job😊🙏🙏
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