प्रकृति के रूप - श्री माधव सिंह नेगी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रकृति के पूजन, हरियाली और खुशहाली के पावन पर्व पर प्रस्तुत है जनपद- रुद्रप्रयाग से शिक्षक साथी श्री माधव सिंह नेगी की कविता  :-


प्रकृति के रूप 

🌳🌳🌳🌳🌳


प्रकृति ममतामयी माँ है,

प्रकृति हमारा पोषण करती है।

प्रकृति हमें सुरक्षा कवच देती है, 

प्रकृति से यह सुन्दर धरती बनती है।। 



प्रकृति अग्नि, प्रकृति वायु है,

यह जल, जमीन और आकाश है। 

प्रकृति बिना हम इस धरा धाम पर,

रहने के काबिल नहीं हैं।। 


प्रकृति के कई रुप हैं,  

प्रकृति पेड़, जंगल, नदी, बारिश है।

प्रकृति तालाब, मौसम, वातावरण है,

पहाड़, पठार, रेगिस्तान, झरने सागर है।। 



कुदरत का हर रूप शक्तिशाली है, 

प्रकृति का हर स्वरूप अद्भुत है, 

प्रकृति कभी धूप है, कभी छाँव है।

प्रकृति कभी सुनहरा दिन है,

तो कभी चाँदनी रात है।।


कभी सुबह और कभी साँझ है,

कभी कल, परसों व कभी आज है।

कभी बादल, कभी बरसात हो,

तुम ईश्वर का अद्भुत प्रसाद हो।।


कभी मोहक बसन्त, कभी तपती ग्रीष्म हो,

कभी वर्षा, शरद, हेमन्त कम्पकपाती शीत हो।

प्रकृति तुम दिन, सप्ताह, महीनों में हो, 

तुम ऋतुओं के सुन्दर-सुन्दर रूप में हो।।


कभी तुम बसन्त बन जाती हो, 

कभी शिशिर तुम हो जाती हो। 

बारह महीनों के समयचक्र में, 

ऋतु षठ रूप दिखाती हो।। 


प्रकृति तुम्हारी लीला न्यारी,

लगती हो तुम अद्भुत प्यारी। 

कहीं गहरी-गहरी घाटियाँ, 

कहीं मनोहर रमणीक वादियाँ।।  


तुम उफनती नदियाँ हो,

खाल, धार, बुग्याळ हो।

तुम कहीं शान्त सरोवर ताल हो,

तुम पर्वत, पठार व मैदान हो।। 



कभी तपती लू बनती हो,

कभी शीतल बयार हो।

कभी शुष्कता लिए हुए हो, 

कभी फैलाती हरियाली हो।। 


तुम कभी खिल-खिलाती हो, 

तुम कभी मौन हो जाती हो। 

कभी धूल-धूसर बन जाती हो, 

कभी सुखद अनुभूति कराती हो।।


तुम सुन्दर-सुन्दर पशु पक्षी हो, 

तुम लाल गगन, नीला आकाश हो।

तुम सुन्दर टिमटिमाते तारों में हो, 

उदय-अस्त सविता में बसी हो।। 


शत् शत् नमन है तुमको माँ,


🙏रचना :-

माधव सिंह नेगी (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि० जैली, 

ब्लॉक- जखोली, जनपद- रुद्रप्रयाग




🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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