आषाढ़ के मेघ - श्रीमती गंगा आर्य

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में  प्रस्तुत है जनपद-पिथौरागढ़ से शिक्षिका बहिन श्रीमती गंगा आर्य जी की कविता :-


आषाढ़ के मेघ


ओ आषाढ़ के मेघ!

बरस करके क्षणभर में।

तुम रुक मत जाना,

अभी धरती की प्यास बहुत है।।



अभी हुआ है तरु से,

पहला-पहला परिचय।

शिशु का रूदन, अभी तो, 

बाँकी जीवन अभिनय।।


ओ कोयल के बोल!

कि क्षण भर में मुखरित होकर, 

रूठ मत जाना,

उपवन में अभी मधुमास बहुत है।।


गीतों में मुखरित,

अभी हो न‌ पाया जीवन।

उनमें तो चित्रित,

प्रयोग के क्षण दो क्षण।।


ओ कविता की शक्ति!

एक क्षण अभिव्यक्ति कर, 

 थक मत जाना।।


एक जिन्दगी अभिलाषाएँ, 

अनगिनत उसकी।

एक लक्ष्य है, पर आशाएँ, 

अनगिनत उसकी।।


ओ प्राणों के बीन‌,

मौन तुम मत हो जाना।

अभी तो इच्छाओं के गायक का,

 उल्लास बहुत है।।


ओ आषाढ़ के मेघ!

बरस करके क्षण भर में,

तुम थम मत जाना,

अभी धरती की प्यास बहुत है।।


🙏रचना:-

श्रीमती गंगा आर्या (प्र०अ०)

रा० प्रा० वि० भट्टीगाँव

वि० ख०- बेरीनाग

जनपद- पिथौरागढ़



🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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