बरगद की व्यथा - श्रीमती अरुण गौतम

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन  में प्रस्तुत है जनपद- हरिद्वार से शिक्षिका बहिन श्रीमती अरुण गौतम जी की कविता :-



बरगद की व्यथा

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बरगद कहता सुनलो,

मेरे जीवन की कथा।

कोई तो जरा सुनलो,

 मेरे मन की है जो व्यथा।।



क्या खूब जमाने थे,

जब लोग पुराने थे।

सब अपने लगते थे,

 कोई न बेगाने थे।। 


सुख दुख में साथ रहे, 

क्या सुन्दर थी गाथा..... 


मेरी जड़ें सींचते थे,

मुझे खूब मानते थे।

मिलजुलकर पास मेरे, 

त्योहार मनाते थे।। 


अब छोड़ रहे अपनी,

 सब अच्छी अच्छी प्रथा..... 


मेरे चारों ओर कभी,

साथियों का डेरा था।

घने आम, नीम, पीपल, 

शीशम का बसेरा था।। 


मानव ने प्रहार किया, 

सब काट के दिए हटा.... 


ठण्डी शीतल वायु, 

घनी छाया देते थे।

हम देते सब तुझको, 

क्या तेरा लेते थे।। 


पछताओगे एक दिन, 

अभी तुझको नही पता...... 



🙏रचना:-


अरुण गौतम

(स०अ०) 

रा० प्रा० वि० गाडोवाली

ब्लॉक- बहादराबाद

जनपद-हरिद्वार



🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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