वर्षा ऋतु - श्रीमती रेखा पुरोहित जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती रेखा पुरोहित जी की कविता :-


वर्षा ऋतु

सफेद चादर कहीं कोहरे की,

कहीं काले बादल मँडराते हैं।

खिली धूप है कहीं सुहानी,

कहीं मेघा जल बरसाते हैं।।


चारों ओर धरा पर देखो,

हरी मखमली दूब है बिछी। 

सूखी मुरझायी सब कलियाँ,

देखो फिर से सब हैं खिली।।



पेड़ और पौधे हरे हो गए,

हरे हुए सब वन सघन।

पशु पक्षी सब मुग्ध हो रहे,

भीगा उनका भी तन मन।।


रिमझिम जब बरखा होती है, 

प्रमुदित मांँ धरती होती है।

पानी की इन बूंदों से ही, 

फिर जल संचय वो करती है।। 


बरखा की ये बूंँदे ही तो,

तन मन को भिगो जाती हैं।

सारे जन मानस की फिर,

वो प्यास बुझाकर जाती हैं।।


🙏 रचना:– 


रेखा पुरोहित (स०अ०) 

रा० प्रा० वि० सौंराखाल

विकासखण्ड- जखोली

जनपद-  रुद्रप्रयाग




🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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