तिरंगा - श्रीमती प्रेमा नयाल
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में "स्वतन्त्रता दिवस की पूर्व संध्या पर" प्रस्तुत है, आज जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती प्रेमा नयाल जी की कविता :-
तिरंगा
भारत माँ का तिरंगा आँचल,
झूम-झूम लहराता है।
आजादी के परवानों की,
अमर कथाऐं सुनाता है।।
कहता है सुनो, ऐ! दुनिया वालो,
यह धरती वीर सपूतों की।
सत्य, अहिंसा, प्रेम पथ पर,
चले शान्ति के दूतों की।।
केसरिया बाना पहन जो,
हँसकर फाँसी झूल गये।
वन्दे मातरम गाते-गाते,
निज प्राणों को भूल गये।।
वही तेज और शौर्य भरा,
यह रंग है केसर वाला।
राजगुरू, बिस्मिल्ल, भगत ने,
माता को दे डाला।।
जीवन अर्पण किया देश को,
बापू धोती वाले ने।
आजादी का दिया उजाला,
भारत के रखवाले ने।।
शान्तिदूत था बना फ़कीरा,
धरती पर वह आया।
अमन शान्ति की राह चलें,
सब दुनिया को बतलाया।।
वही धवल रंग अमन शान्ति का,
लहराया माँ के आँचल में।
ऐसे जैसे लहर उठी हो,
पावन गंगा के जल में।।
हरे खेत हों वन और उपवन,
भारत के हर हाल में।
हरे रंग से रंगी चुनरिया,
माँ की बहादुर लाल ने।।
तीन रंगों की ओढ़ चुनरिया,
माता बड़ी निहाल हुई।
समृद्ध हुई माँ भारती की,
सन्तानें खुशहाल हुईं।।
ऐसे वीर सपूत हुए हैं,
मेरे भारत देश में।
देवों ने भी जन्म लिया
जहाँ इन्सानों के वेश में।।
🙏 रचना :-
प्रेमा नयाल (स०अ०)
रा० प्रा० वि० त्योना
वि० ख० - भीमताल, नैनीताल
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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