हिन्दी- सुश्री विजयलक्ष्मी जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद नैनीताल से शिक्षिका बहिन सुश्री विजयलक्ष्मी जी की कविता -
✍️हिन्दी
संस्कृत ने संस्कृति बनायी,
हिन्दी ने हिन्दुस्तान।
ऐसी देवमयी भाषा को,
कोटि कोटि प्रणाम।।
माँ की ममता-पिता का प्यार है हिन्दी,
सरल-सौम्य, मर्यादित संस्कार है हिन्दी।
मेरे हृदय का उद्गार है हिन्दी,
प्रेम का पारावार है हिन्दी।।
सृष्टि का अह्लाद है हिन्दी।
आत्म-अन्तर्नाद है हिन्दी।
मेरी वाणी का साज है हिन्दी,
मेरी धड़कन की आवाज है हिन्दी।।
कश्मीर से कन्याकुमारी तक,
जोड़ती तार है हिन्दी।
भारत माँ का अनुपम दुलार है हिन्दी,
लक्ष्मीबाई का शौर्य प्रताप की आन है हिन्दी।।
अशफाक की शहादत शेखर की शान है हिन्दी,
सुभाष का स्वाभिमान भगत का बलिदान है हिन्दी।
मेरी जान है, मेरी पहचान है हिन्दी,
सूर के पद तुलसी की चौपाई है हिन्दी।।
कबीर की साखी में समाई है हिन्दी,
दादा-नाना के किस्सों का विस्तार है हिन्दी।
नानी-दादी की कहानी का आधार हिन्दी,
मेरा सम्मान है, मेरा प्राण है हिन्दी।।
मेरी उन्नति और उत्थान है हिन्दी,
बसन्त की बहार, रंगों की फुहार है हिन्दी।
दीपकों की जलती हुई कतार है हिन्दी,
मेघों से झरती रिमझिम धार है हिन्दी।।
हिम की शीतल सलिल धार है,
झरनों की झर-झर धार है हिन्दी।
नदियों का कल-कल निनाद है हिन्दी,
एकता की तार, समता की रसधार है हिन्दी।।
भाव का श्रृंगार है हिन्दी,
ज्ञान पुष्पित हार है हिन्दी।
कृष्ण का योग-गीता का ज्ञान है हिन्दी।
सभी भारतीयों का स्वाभिमान है हिन्दी।।
🙏 रचना :-
सुश्री विजयलक्ष्मी ( प्र०अ०)
रा० प्रा० वि० चन्द्रनगर
वि०ख० - रामनगर
जिला- नैनीताल, उत्तराखण्ड
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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