कालजयी गुरु - श्रीमती जया चौधरी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला *हिम मन मन्थन* में प्रस्तुत है, आज *जनपद चमोली* गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती *जया चौधरी* जी की कविता -
✍️कालजयी गुरु
डगमगाते लड़खड़ाते,
कदम गिरते उठते।
मजबूत खड़ा किया तुमने,
ज्ञान के स्तम्भों से।।
छोटी नाजुक उँगलियों को,
कलम पकड़ाके।
वर्णों के मोती इकट्ठे कर,
शब्द सागर किये तुमने।।
पिता तुल्य सम्बल तुम्हीं,
मासूम आँखों के।
वाणी की ममता भी हो,
तुतलाती बोलों के।।
मजबूत धुरी भी हो,
जीवन किले की पहली।
पहचान का दर्पण भी हो,
अच्छे बुरे को समझने का।।
निर्माता कुम्हार बनकर,
साकार करने का बल हो।
कच्ची गीली मिट्टी को,
कुछ सीखने की खुशी हो।।
नन्हीं सी आँखों में,
अज्ञान तम को चीरते हो।
ज्ञान के प्रकाश से,
भविष्य सँवारते हो।।
छोटी सी कक्षाओं में,
कालजयी तुम गुरु हो।
सच्चे निर्माता बनकर,
मार्गदर्शी वाणी से
जीवन के पाठ सिखाते हो।।
फैलती जब शिष्य की कान्ति
चिर आत्मिक शान्ति भी हो।
उज्ज्वल राष्ट्र बनाने को तत्पर,
अनमोल तजुर्बों की
सृजनशील सीख भी हो।।
🙏 रचना-
जया चौधरी (स०अ०)
रा० प्रा० वि० बलखिला मलारी,
वि० ख० - जोशीमठ, चमोली
उत्तराखण्ड
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

बहुत सुन्दर कविता है👌👌🌹🌷
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