बादल - श्रीमती पुष्पा रौथाण
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद रुद्रप्रयाग से शिक्षिका बहिन श्रीमती पुष्पा रौथाण जी की कविता -
बादल
हे सावन के मेघ!
तू बस इतना ही बरसना।
रूखे-सूखे स्रोतों को,
फिर पानी से भर देना।।
सूरज की गर्मी से नित,
जो तन है मुरझाए।
रिमझिम जल की बूँदों से,
नव-चेतन, नव-प्राण पाये।।
हरे-भरे फूलों से,
बने धरती का गहना,
हे सावन के मेघ!
तू बस इतना ही बरसना।।
सुनना सबकी व्यथा,
मत करना मनमानी।
धन, माटी की क्षति से बचना,
मत करना पानी-पानी।।
सब दुःखी तुझे देंगे गाली,
तुझे पड़ेगा सहना।
हे सावन के मेघ!
तू बस इतना ही बरसना।।
मानव अपने काम-धन्धे,
दिन भर जो करते रहते।
थकी हुई दिनचर्या से,
रात को वो सोते रहते।।
रात को रिमझिम-रिमझिम,
दिन को मत बरसना।
हे सावन के मेघ!
तू बस इतना ही बरसना।।
खेती पर ही आश्रित हैं सब,
भोले-भाले गरीब किसान।
तू ही इनका अन्नदाता है,
मत करना इनका नुकसान।।
वर्ष भर की मेहनत पर,
हिम, ओले न बरसाना,
हे सावन के मेघ!
तू बस इतना ही बरसना।।
छोटे तृणों से निर्मित,
मेरी यह छोटी कुटिया।
इस कुटिया में ही मुझको,
देना जीवन भर छाया।।
तेरी गर्जना से डर लगता,
अतिवृष्टि न कर जाना।
माटी-पत्थर पेड़ पौधों को,
पानी संग न बहाना।।
हे सावन के मेघ!
तू बस इतना ही बरसना।
रूखे-सूखे स्रोतों को,
फिर पानी से भरना।।
🙏 रचना-:
पुष्पा रौथाण (स०अ०)
रा० उ० प्रा० वि० बसुकेदार
अगस्त्यमुनि, रुद्रप्रयाग
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड
बहुत सुंदर रचना
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