संस्कृत के महाकवि- कालिदास -श्री कालिका प्रसाद सेमवाल
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में महाकवि कालिदास जी की पावन जयन्ती के सुअवसर पर प्रस्तुत है, आज जनपद रुद्रप्रयाग से श्री कालिका प्रसाद सेमवाल जी (अवकाश प्राप्त, प्रवक्ता) का लेख -:
संस्कृत भाषा के महाकवि थे- कालिदास
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महाकवि कालिदास संस्कृत भाषा के सबसे महान कवि नाटककार थे कालिदास नाम का शाब्दिक अर्थ काली का सेवक है इनकी प्रतिभा, अद्भुत कल्पना शक्ति और उत्कृष्ट नाटक निर्माण के कारण ही भारतीय विद्वानों ने इन्हें कवि कुल गुरु और कवि शिरोमणि की उपाधियाँ प्रदान की थी।
कालिदास अपनी अंलकार युक्त सुन्दर सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रुप से जाने जाते हैं उनके ऋतु वर्णन अद्वितीय और बेमिसाल हैं, संगीत उनके साहित्य का प्रमुख अंग है
उन्होंने अपने श्रृंगार रस और साहित्यिक सौन्दर्य के साथ-साथ आदर्शवादी परम्पराओं और नैतिक सिद्धान्तों का समुचित ध्यान रखा है।उनका नाम अमर है और उनका स्थान बाल्मीकि और व्यास की परम्परा में है।
महाकवि कालिदास जी का जन्म कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को उत्तराखण्ड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले के कविल्ठा गांँव में हुआ था।
कालिदास कुछ ही वर्ष यहांँ रहे बाद में उज्जयिनी चले गये थे और सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में नवरत्नों में से एक थे। कहा जाता है कि प्रारम्भिक जीवन में कालिदास अनपढ़ और मूर्ख थे। लेकिन अयोग्य होने के कारण पत्नी द्वारा अपमानित किए जाने और घर से निकाले जाने पर उन्होंने अपनी योग्यता का विस्तार किया और एक दिन देश के महाकवि कालिदास बन गए।
कालिदास के महाकाव्य में रघुवंश के राजाओं की गाथाओं का वर्णन, शिव-पार्वती की और कार्तिकेय के जन्म की कथा का भी वर्णन मिलता है।
महाकवि कालिदास की काव्य प्रतिभा उनकी कृतियों में दिखाई देती है। अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक में दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रणय वियोग एवं पुनर्मिलन का वर्णन है।
मेघदूतम् गीतिकाव्य है एक विरही यक्ष की मार्मिक मनोव्यथा का अभूतपूर्व चित्रण है।
कुमारसम्भवम् कालिदास की अन्तिम रचना मानी जाती है जिसमें शिव पार्वती के विवाह कार्तिकेय का जन्म तथा तारकासुर के वध कथा वर्णित है।
इसके अतरिक्त ऋतुसंहारम् , मालविकाग्निमित्रम, विक्रमोविशीयम् आदि नाटक भी हैं।
कालिदास संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार माने जाते हैं। उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएंँ की और उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं।
उत्तराखण्ड को कालिदास की जन्मभूमि मानने के पीछे अनेकानेक प्रमाण हैं उन्होंने प्रकृति का सूक्ष्म वर्णन किया है कालिदास के ग्रन्थों में पहाड़ों के वन और पुष्पों का वर्णन बडी़ सूक्ष्मता से किया है। जो पेड़-पौधे पर्वतीय क्षेत्र में मिलते हैं उनका शानदार चित्रण कर रखा है।
कालिदास जब उज्जैन गये तो अपनी आराध्य देवी काली का वहांँ पर भी मन्दिर स्थापित किया जो गढ़कालिका के नाम से आज भी है, अतः स्पष्ट हो रहा है कि गढ़वाल की काली।
कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं। कालिदास वैदर्भी रीति के कवि हैं और तदनुरूप वे अपनी अलंकार युक्त सरल और मधुर भाषा के लिये विशेष रूप से जाने जाते हैं।
महाकवि कालिदास ने अपने जीवन की सही व्यथा कथा को मेघदूत में कहा है। वे एक कुशल मनोवैज्ञानिक थे, यही कारण है उन्होंने मेघदूत की नायिका की मनोदशा का सांगोपांग वर्णन किया है।
🙏आलेख-:
कालिका प्रसाद सेमवाल (अवकाश प्राप्त प्रवक्ता)
डायट- रतूड़ा, रुद्रप्रयाग
मानस सदन अपर बाजार
रुद्रप्रयाग
🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड
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