भैला-भैला- श्रीमती अंजना कण्डवाल 'नैना' जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में श्री हरिबोधनी एकादशी पावन पर्व के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद पौड़ी गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती अंजना कण्डवाल 'नैना' जी की कविता - 


भैला-भैला


भैला भैला इगासी ऐ ग्याई,

खेला भैला, खेला भैला।

गोरू की गोट घोर ऐ ग्याई

खेला भैला, खेला भैला।। 



बीती चौमासु देव, बिजी गयेनि,

खेला भैला, खेला भैला।

देवतों को रांसो, मण्डाण लगावा, 

खेला भैला, खेला भैला।।


नन्दा का मैत शिवजी सौरस मा,

खेला भैला, खेला भैला।

तुलसा जी को ब्यौ दिन ऐ ग्याई, 

खेला भैला, खेला भैला।।


माधो भण्डारी रण जीती ऐग्ये, 

खेला भैला, खेला भैला।

सैरू गढ़वाल फूलों न सजीग्ये, 

खेला भैला, खेला भैला।।


गौं कु गुठयारों पंचैती चौक मा,

खेला भैला, खेला भैला।

बन बनी फूलों न थाली सजावा,

खेला भैला, खेला भैला।।


गोधन सींगों मा तेल लगावा, 

खेला भैला, खेला भैला।

फुल माला लेकि पूजन करावा, 

खेला भैला, खेला भैला।।


बळ्दों की जोड़ी थैं तेल पिलवा, 

खेला भैला, खेला भैला।

गोरू बछरों पीण्डू खलावा,

खेला भैला, खेला भैला।।



🙏 रचना-:

अंजना कण्डवाल 'नैना'

रा० उ० प्रा० वि० चामसैण

वि०ख०- नैनीडाण्डा

पौड़ी गढ़वाल



🙏संकलन:- टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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