घर वापसी - श्रीमती माधुरी नैथानी जी

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में पलायन के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत है, आज जनपद-पौड़ी गढ़वाल गढ़वाल से शिक्षिका बहिन श्रीमती माधुरी नैथानी जी द्वारा रचित कविता-



✍️घर वापसी


देखो दूर देश से परिन्दे, 

अपने घोसलों में आ रहे हैं। 

हमको जननी जन्मभूमि का, 

अर्थ समझा रहे हैं।। 


विकास के दौर में जिन गाँवों को,

पिछड़ा करार दिया था। 

देखो वक्त ने ये करवट बदली, 

वही गाँव वापस आ रहे हैं।। 



वीरान सुनसान जो गाँव, 

पिछड़ेपन का पर्याय बन गये थे।

थके हारों को वही गाँव, 

आज पानी पिला रहे हैं।


मिट्टी, जड़, जमीन, 

गाँव की परिभाषा थी। 

हम मिट्टी से जुड़े रहें, 

यह पुरखों की अभिलाषा थी। 


मिट्टी खिलता बचपन है मिट्टी,     

मिट्टी बढ़ती जवानी है। 

मिट्टी पेट का साधन है, 

मिट्टी जीवन की कहानी है।।

 

दादा-दादी ने बचपन में, 

ये कहानी सुनायी है।

जड़ें मिट्टी में जमाकर रखना, 

इसमें सदियों की गहराई है।। 


ये घरोंदे, छत, ये आँगन, द्वार, 

इनको कभी न बिसराना। 

ये हमारे पूर्वजों की, 

पसीने की कमाई है।। 


ये पनघट, नदी, नाले, 

गाँव में पीपल की छाँव। 

इन्हें मत छोड़कर जाना, 

हमनें उमर इनमें बितायी है।। 


देखो वीरान घरों की आहें थीं, 

जो पीढ़ी लौट आयी है। 

गर्दिश के दौर में हम सबको, 

अपने गाँव की याद आयी है।। 


     🙏रचना-:

   माधुरी नैथानी (स०अ०)

  रा० उ० प्रा० वि०-भटोली

  ब्लॉक- खिर्सू, पौड़ी गढ़वाल



🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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