बेटी का सपना- श्रीमती रश्मि पाण्डेय

 📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद-नैनीताल से शिक्षिका बहिन श्रीमती रश्मि पाण्डेय जी द्वारा रचित कविता-


बेटी का सपना



उड़ सकूँ इस खुले अम्बर में,

ना डरूँ, चलूँ निर्भय होकर।

पर गिद्धों की भीड़ यहाँ,

तोड़ दिए चिड़िया के पर।।


वहशियों ने अत्याचारों से,

जब मेरे तन को छिन्न किया।

मोमबत्ती जलाकर समाज ने,

निर्भया, दामिनी नाम दिया।।



मेरे बचपन को छीन मुझे,

निर्ममता से तुम कुचलते हो।

फिर देकर श्रद्धाञ्जलि मुझको,

बिटिया, गुड़िया तुम कहते हो।।


छोटी सी मेरी उम्र अभी,

पर तुमको दया नहीं आती।

उल्टा मुझ पर प्रतिबन्ध लगा,

हँसते हो, शर्म नहीं आती।।


घर से निकले, कैसे निकले,

किस-किस से उसको है बचना?

डर जाती है, मर जाती है,

कैसे देखे बेटी सपना।।


थी नारी कभी स्वतन्त्र यहाँ,

थी गार्गी, अपाला और घोषा,

है प्रश्न आज इस भारत से,

क्या मेरा सपना भी सच होगा?


🙏 रचना-:

रश्मि पाण्डेय (स०अ०) 

रा० उ० प्रा० वि० भरतपुर

वि० ख०- भीमताल, नैनीताल



🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड

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