वो बूढ़ा मजदूर - श्री विनोद सुयाल जी
📝प्राथमिक शिक्षकों की अपनी साहित्यशाला हिम मन मन्थन में प्रस्तुत है, आज जनपद-नैनीताल से शिक्षक साथी श्री विनोद सुयाल जी द्वारा रचित कविता-
🙏✍️वो बूढ़ा मजदूर
आजाद जग ये हो गया,
पर वो रहा गुलाम।
एक बूढ़ा मजदूर जो,
कर न सके कुछ काम।।
काम करे तो क्या करे,
हालत से मजबूर।
हाड़-हाड़ काया भयी,
सपने चकनाचूर।।
गाल पोपले हो गए,
गयी जवानी दूर।
फिर भी तिल-तिल मर रहा,
होकर वो मजबूर।।
सर्दी में था अकड़ रहा,
गर्मी से अनजान।
तन पर झीना धींगरा,
वक्त बड़ा बलवान।।
रुखा सूखा खाय के,
तापन बैठा अलाव।
कोई खाए बाजरा,
कोई खाए पुलाव।।
जैसे-तैसे कट गए,
बर्फीले दिन चार।
दीन-अभागे पर तभी,
लू ने किया प्रहार।।
लू ने किया प्रहार कि,
धरा उगले अंगारे।
जेठ मास की दुपहरी,
तन पर कोड़े मारे।।
फिर आया आषाढ़ तो,
वर्षा भई भरपूर।
दो वक्त की रोटी भी,
हो गई उससे दूर।।
सर्दी गई, गर्मी गई,
और गई बरसात।
निर्बल देह ने काट लिए,
वो श्रापित दिन-रात।।
दीन-हीन काया के जब,
पूरे हुए दिन चार।
एक आह निकली तन से,
छोड़ दिया संसार।।
🙏 रचना-:
विनोद सुयाल (स०अ०)
रा० प्रा० वि० भाॅकर
वि० ख०- भीमताल, नैनीताल
🙏संकलन-: टीम हिम मन मन्थन, उत्तराखण्ड
Very nice
जवाब देंहटाएंअति सुंदर कविता .......
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